दिल्ली कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में बाधा डालने वाले दो आरोपी लॉ स्टूडेंट्स को दी ज़मानत

punjabkesari.in Wednesday, Jul 29, 2026 - 12:36 PM (IST)

नेशनल डेस्क। पटियाला हाउस कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान गाली-गलौज करने, कागज़ फेंकने और सुरक्षाकर्मी के साथ मारपीट करने के आरोपी दो लॉ स्टूडेंट्स को ज़मानत दे दी है। बता दें कि दिल्ली पुलिस ने लॉ स्टूडेंट्स प्रबल प्रताप सिंह और चंद्र भान को गिरफ्तार किया था। ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC) रवि ने 27 जुलाई को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और ज़मानत याचिकाओं पर विचार करने के बाद प्रबल प्रताप सिंह और चंद्र भान को ज़मानत दे दी।

वहीं JMFC ने 27 जुलाई को आदेश दिया, ऊपर की गई चर्चा को देखते हुए, दोनों ज़मानत याचिकाएं मंज़ूर की जाती हैं। आरोपी प्रबल प्रताप और आरोपी चंद्रभान को रेगुलर ज़मानत पर रिहा करने का निर्देश दिया जाता है, बशर्ते वे संबंधित कोर्ट/ड्यूटी मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के लिए 25,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही राशि की एक ज़मानत (श्योरिटी) जमा करें।

कोर्ट ने यह शर्त भी लगाई है कि ज़रूरत पड़ने पर आरोपी जांच/ट्रायल में शामिल होंगे। आरोपी सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से सबूतों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेंगे और न ही शिकायतकर्ता या किसी अभियोजन गवाह को प्रभावित करने या उनसे संपर्क करने की कोशिश करेंगे।

आरोपियों के वकील ने दलील दी कि दोनों आरोपी युवा छात्र हैं और उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है यह घटना देश की सर्वोच्च अदालत के सामने बिना किसी वकील के पेश होने के दौरान अत्यधिक भावनात्मक आवेश में हुई थी, न कि किसी सोची-समझी साज़िश के तहत जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस रिपोर्ट में भी कहा गया है कि दोनों आरोपियों में से किसी के भी मामले में आगे कोई जांच या रिकवरी बाकी नहीं है। वकील ने यह भी कहा कि जिन अपराधों का आरोप है, वे गंभीर प्रकृति के नहीं हैं और उनमें अधिकतम सज़ा दो साल से ज़्यादा नहीं है और उन्हें जेल में रखने से जांच के मकसद में कोई मदद नहीं मिलेगी।

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एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (APP) भानु प्रताप सिंह ने ज़मानत याचिकाओं का विरोध किया। आरोपियों को ज़मानत देते हुए कोर्ट ने कहा, मौजूदा आरोप ऐसे व्यवहार को उजागर करते हैं जो सीधे तौर पर उस मर्यादा और गरिमा को प्रभावित करते हैं जिसकी हकदार हर कोर्ट और खासकर देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत - अपने सामने पेश होने वाले लोगों से अपेक्षा करती है। 

कोर्ट ने आगे कहा कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह अपने मामले के नतीजे से कितना भी परेशान क्यों न हो या उसका कोई वकील न हो, उसे खुली अदालत में कागज़ फेंकने या पीठासीन अधिकारी (और खासकर भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय) के प्रति अपशब्दों का इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं मिल जाता। मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय उन अधिकारों और आज़ादी का अंतिम रक्षक है जिनका सहारा हर नागरिक जिसमें आरोपी भी शामिल हैं न्यायपालिका का दरवाज़ा खटखटाते समय लेता है।

कोर्ट ने कहा, अगर इस तरह के व्यवहार पर कोई टिप्पणी नहीं की गई तो इसे चुपचाप स्वीकार्य मान लिए जाने का खतरा है। इसलिए इन कार्यवाही के रिकॉर्ड के तौर पर यह स्पष्ट रूप से कहना ज़रूरी है कि ऐसे व्यवहार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और इसकी कड़ी निंदा की जाती है। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा, उम्मीद है कि भविष्य में आरोपी इस या किसी भी अन्य अदालत के सामने संयम और मर्यादा के साथ पेश आएंगे जिसकी न्याय व्यवस्था के संचालन के लिए ज़रूरत होती है। 

कोर्ट ने 15 जुलाई को लॉ के छात्र प्रबल प्रताप सिंह और चंद्र भान को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। उन्हें 13 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के एक जज के सामने कागज़ फेंकने और सुरक्षा कर्मचारियों के साथ हाथापाई करने से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था। तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई है। वे लखनऊ यूनिवर्सिटी के छात्र हैं।

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इससे पहले 13 जुलाई को कस्टोडियल रिमांड मांगते हुए दिल्ली पुलिस ने कहा था कि जांच के दौरान पता चला कि 10 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में खुद अपना पक्ष रखते हुए प्रबल प्रताप सिंह ने जानबूझकर न्यायिक कार्यवाही में बाधा डाली। उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अपशब्दों और असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया कोर्ट रूम के अंदर कागज़ फेंके और आक्रामक व्यवहार किया। आरोप है कि जब हेड कॉन्स्टेबल रवींद्र कुमार ने उन्हें रोकने और व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश की तो प्रबल प्रताप सिंह ने उनके कानूनी हस्तक्षेप का विरोध करते हुए उन पर हमला किया और आपराधिक बल का इस्तेमाल किया।

उन्होंने उनका हाथ हटाने और उन्हें धक्का देने की कोशिश की जिससे एक सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्यों के पालन में बाधा उत्पन्न हुई। पुलिस ने यह भी बताया कि आरोपी के पास से कुछ ऐसे पर्चे बरामद हुए जिनमें आपत्तिजनक शब्द लिखे थे। इन पर्चों का स्रोत, लेखक, छपाई, प्राप्ति, उद्देश्य और इनके इस्तेमाल या वितरण के इरादे का अभी पता लगाया जाना बाकी है।


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Content Editor

Rohini Oberoi

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