ट्रांसजेंडर्स, सेक्स वर्कर्स और समलैंगिक क्यों नहीं कर सकते ब्लड डोनेट? केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया ये बड़ा कारण

punjabkesari.in Friday, Mar 13, 2026 - 01:31 PM (IST)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुषों (MSM) और महिला सेक्स वर्कर्स (FSW) को रक्तदान से बाहर रखने की नीति का मजबूती से समर्थन किया है। 

सरकार के अनुसार, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, पुरुष जो पुरुषों के साथ यौन संबंध रखते हैं (MSM) और महिला सेक्स वर्कर्स (FSW) को रक्तदान से बाहर रखना किसी भी तरह का भेदभाव नहीं है। यह निर्णय पूरी तरह से विशेषज्ञों की राय और वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित है। स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्टों का हवाला देते हुए सरकार ने दलील दी है कि इन विशिष्ट समूहों में एचआईवी और हेपेटाइटिस जैसे संक्रमणों (TTIs) की दर सामान्य आबादी के मुकाबले 6 से 13 गुना अधिक पाई गई है। 

सरकार का मानना है कि किसी व्यक्ति के रक्तदान करने की इच्छा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उस मरीज की जान और सुरक्षा है, जिसे वह खून चढ़ाया जाना है। अदालत में यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि यह मामला सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य और मेडिकल साइंस से जुड़ा है, इसलिए इसमें विशेषज्ञों के निर्णय को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

सुरक्षित रक्त पाने का अधिकार बनाम रक्तदान की इच्छा
सरकार की दलील का मुख्य आधार यह है कि खून प्राप्त करने वाले व्यक्ति की सेहत और सुरक्षा किसी भी व्यक्ति की रक्तदान करने की इच्छा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि एक मजबूत ब्लड ट्रांसफ्यूजन सिस्टम बनाए रखना सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी जिम्मेदारी है। सरकार के अनुसार, सुरक्षित खून पाना एक मौलिक अधिकार है और इस मामले में कार्यपालिका व मेडिकल विशेषज्ञों के निर्णय पर ही भरोसा किया जाना चाहिए क्योंकि यह तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र है।

'हाई-रिस्क' समूहों से जुड़े वैज्ञानिक आंकड़े
सरकार ने अदालत को बताया कि यह प्रतिबंध सांख्यिकीय आंकड़ों पर आधारित है। स्वास्थ्य विभाग की 2020-21 की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रांसजेंडर, MSM और महिला सेक्स वर्कर्स में एचआईवी संक्रमण की दर सामान्य वयस्क आबादी की तुलना में 6 से 13 गुना अधिक पाई गई है। अगस्त 2025 में आई नवीनतम विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में भी यह निष्कर्ष निकाला गया है कि वर्तमान में इन नियमों में किसी भी तरह के बदलाव की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ढील देने से राष्ट्रीय रक्त आपूर्ति की विश्वसनीयता को गंभीर खतरा हो सकता है।

याचिकाकर्ताओं की आपत्ति और समानता का दावा
दूसरी ओर, ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट थंगजाम सांता सिंह और अन्य याचिकाकर्ताओं ने 2017 की गाइडलाइंस के उन क्लॉज को चुनौती दी है जो इन समुदायों को 'स्थायी रूप से' रक्तदान से रोकते हैं। उनका तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत समानता और जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जोखिम 'पहचान' (Identity) से नहीं बल्कि 'असुरक्षित व्यवहार' (Behavior) से होता है। उनका तर्क है कि जब हर यूनिट खून की एचआईवी और NAT जांच होती ही है, तो केवल पहचान के आधार पर किसी समूह को पूरी तरह प्रतिबंधित करना तार्किक नहीं है। 


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Editor

Anu Malhotra

Related News