स्कूल सर्टिफिकेट, PAN, वोटर आईडी... 15 दस्तावेज़ दिखाए, फिर भी साबित नहीं कर पाया भारतीय नागरिकता, जानिए क्यों
punjabkesari.in Thursday, Jul 02, 2026 - 07:54 AM (IST)
15 Documents/Indian Citizenship: गुवाहाटी के पास किराए के मकान में रहने वाले एक व्यक्ति ने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए अदालत में कई दस्तावेज़ और मौखिक गवाही पेश की। उसके पास 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स (NRC) की प्रतियां थीं, जिनमें उसके पिता और दादा-दादी के नाम दर्ज थे। इसके अलावा उसने कई वर्षों की वोटर लिस्ट, 2017 का स्कूल प्रमाणपत्र, पैन कार्ड, वोटर आईडी (EPIC) और अपने पिता की गवाही भी पेश की, ताकि वह अपने परिवार से संबंध साबित कर सके।
जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहान की डिवीजन बेंच ने कहा कि पेश किए गए किसी भी दस्तावेज़ से यह साबित नहीं हो सका कि याचिकाकर्ता का संबंध उसके बताए गए पूर्वजों से है। अदालत ने कहा कि फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 9 के तहत यह जिम्मेदारी याचिकाकर्ता की थी कि वह साबित करे कि वह विदेशी नहीं, बल्कि भारतीय नागरिक है, लेकिन वह ऐसा करने में असफल रहा।
याचिकाकर्ता ने कौन-कौन से दस्तावेज़ पेश किए?
याचिकाकर्ता ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के सामने कुल 15 दस्तावेज़ जमा किए। इनमें शामिल थे:
-1951 के NRC की कंप्यूटरीकृत प्रतियां, जिनमें उसके पिता और दादा-दादी के नाम थे।
-1996 से 2017 तक की प्रमाणित वोटर लिस्ट, जिनमें परिवार के सदस्यों के नाम दर्ज थे।
-1973 में उसके दादा द्वारा खरीदी गई जमीन की मूल रजिस्ट्री।
-हाशडोबा आंचलिक हाई स्कूल का 2017 का स्कूल प्रमाणपत्र।
-उसका पैन कार्ड।
-उसका वोटर फोटो पहचान पत्र (EPIC)। याचिकाकर्ता ने अपने लिखित बयान में बताया कि उसका जन्म 1988 में हुआ था। वह गुवाहाटी के बोरबोरी इलाके में किराए के मकान में रहकर दिहाड़ी मजदूरी करता है।
उसने बताया कि नदी के कटाव के कारण उसका परिवार कई बार स्थान बदलने के लिए मजबूर हुआ। पहले वे चराई खसारा में रहते थे, फिर धोबाकुरा, उसके बाद घुगुडोबा और अंत में हाशडोबा में बस गए। उसने यह भी कहा कि उसने 1999 में हाशडोबा आंचलिक हाई स्कूल में पांचवीं कक्षा में पढ़ाई की थी। इन दावों के समर्थन में उसने और उसके पिता ने अदालत में मौखिक गवाही भी दी।
हाई कोर्ट ने किन दस्तावेज़ों को मानने से इनकार किया?
अदालत ने कुल 15 दस्तावेज़ों में से कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों को स्वीकार नहीं किया। इनमें सबसे महत्वपूर्ण 1951 का NRC रिकॉर्ड था। असम में 1951 की जनगणना के बाद नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स (NRC) तैयार किया गया था। बाद में 2019 में इसका अपडेटेड संस्करण जारी किया गया, जिसमें लोगों को अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए 1951 के NRC या 1971 से पहले के वैध दस्तावेज़ों के आधार पर अपने पूर्वजों से संबंध दिखाना होता था।
हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को सही माना कि 1951 का NRC रिकॉर्ड केवल एक फोटोकॉपी या कंप्यूटर से तैयार की गई जानकारी थी, जिसे कानून के अनुसार प्रमाणित नहीं किया गया था। अदालत ने कहा कि यह केवल एक "कंप्यूटर जनरेटेड स्टेटमेंट" था, जिस पर इमेज आईडी और "Generated by DLDD Version 6.0" लिखा हुआ था। DLDD का मतलब Digitised Legacy Data Development है।
कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63(4)) के तहत जरूरी प्रमाणपत्र के बिना ऐसे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा अदालत ने जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 15 का हवाला देते हुए कहा कि जनगणना से जुड़े रिकॉर्ड अदालत में सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किए जा सकते। इस कारण 1951 के NRC को स्वीकार नहीं किया गया और याचिकाकर्ता अपने पूर्वजों से संबंध साबित नहीं कर सका।
स्कूल प्रमाणपत्र भी नहीं माना गया
2017 के स्कूल प्रमाणपत्र को भी अदालत ने अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता स्कूल के हेडमास्टर को गवाह के रूप में पेश नहीं कर पाया। साथ ही स्कूल का प्रवेश रजिस्टर भी अदालत में प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे प्रमाणपत्र की सत्यता साबित नहीं हो सकी।
जमीन की रजिस्ट्री भी काम नहीं आई
1973 में खरीदी गई जमीन की रजिस्ट्री को भी अदालत ने स्वीकार नहीं किया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि इससे यह साबित नहीं होता कि याचिकाकर्ता का अपने दादा से कानूनी संबंध है। अदालत ने यह भी पूछा कि यदि जमीन वास्तव में उसके दादा की थी तो बाद में वह उनके कानूनी वारिसों के नाम क्यों नहीं हुई। इसके अलावा जमीन के राजस्व रिकॉर्ड या मालिकाना हक के हस्तांतरण से जुड़े कोई दस्तावेज़ भी पेश नहीं किए गए। इसलिए यह दस्तावेज़ भी नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।
पैन कार्ड और वोटर आईडी भी नागरिकता का प्रमाण नहीं
हाई कोर्ट ने साफ कहा कि पैन कार्ड और EPIC (वोटर आईडी) भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं माने जा सकते। इसलिए इन दस्तावेज़ों से भी याचिकाकर्ता को कोई राहत नहीं मिली।
वोटर लिस्ट में कई विरोधाभास मिले
अदालत ने वोटर लिस्ट में कई गंभीर कमियां पाईं। उदाहरण के लिए, 1979 की वोटर लिस्ट में परिवार के एक सदस्य की उम्र 25 वर्ष दर्ज थी, जबकि 1989 की सूची में उसी व्यक्ति की उम्र केवल 29 वर्ष दिखाई गई। 10 साल में उम्र केवल चार साल बढ़ना रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। कोर्ट ने यह भी पाया कि वोटर लिस्ट में कुछ ऐसे लोगों के नाम थे जिनके परिवार से संबंध का कोई प्रमाण नहीं दिया गया।
सबसे बड़ी समस्या यह थी कि परिवार के लोगों के नाम तीन अलग-अलग गांवों-धोबाकुरा, घुगुडोबा और हाशडोबा-की वोटर लिस्ट में मिले, लेकिन इनके बीच कोई ठोस दस्तावेज़ी संबंध स्थापित नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि ये तीनों अलग-अलग परिवारों की तरह दिखाई देते हैं और इससे लगातार चली आ रही वंशावली साबित नहीं होती। इन्हीं कारणों से फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट दोनों ने वोटर लिस्ट को नागरिकता का भरोसेमंद प्रमाण नहीं माना।
मौखिक गवाही भी पर्याप्त नहीं मानी गई
याचिकाकर्ता के पिता ने अदालत में गवाही दी, लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि केवल मौखिक बयान के आधार पर नागरिकता साबित नहीं की जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ों का कानूनी रूप से प्रमाणित होना जरूरी है। केवल गवाही पर्याप्त नहीं होती। अदालत ने यह भी देखा कि पैन कार्ड में याचिकाकर्ता का जन्म वर्ष 1988 दर्ज था, लेकिन उसके पिता इस तथ्य की सही पुष्टि नहीं कर पाए। साथ ही जिरह के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के पिता की पहचान 2015 की वोटर लिस्ट में दर्ज व्यक्ति से मेल नहीं खाती थी, जबकि उनका नाम 1970 की वोटर लिस्ट में भी मौजूद था।
हाई कोर्ट का अंतिम फैसला
हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने किसी तथ्य या कानून को गलत तरीके से समझा है। अदालत ने रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं पाया जिससे ट्रिब्यूनल का फैसला गलत या तर्कहीन माना जा सके। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के वकील यह नहीं दिखा सके कि ट्रिब्यूनल की राय में कोई कानूनी या तथ्यात्मक गलती थी। इस आधार पर हाई कोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा। नतीजतन, 15 दस्तावेज़ और मौखिक गवाही पेश करने के बावजूद अदालत ने याचिकाकर्ता को भारतीय नागरिक नहीं माना और उसे विदेशी घोषित करने के ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराया।
