एक लीटर इथेनॉल के लिए 10,000 लीटर पानी: भारत का फ्यूल पर जोर पानी की कमी को और बढ़ाएगा
punjabkesari.in Thursday, Apr 30, 2026 - 01:21 AM (IST)
नई दिल्ली: भारत सरकार पर्यावरण को बचाने और पेट्रोल पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग (मिश्रण) को बढ़ावा दे रही है, लेकिन इसकी भारी कीमत देश के जल संसाधनों को चुकानी पड़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जिसे 'स्वच्छ ईंधन' बताया जा रहा है, वह असल में देश के जल संकट को और भी गंभीर बना सकता है।
1 लीटर ईंधन और 10 हजार लीटर पानी
चौंकाने वाली बात यह है कि चावल से मात्र एक लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 10,790 लीटर पानी की खपत होती है। इसमें सिंचाई और प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) दोनों शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, एक किलो चावल उगाने में ही 3,000 से 5,000 लीटर पानी लग जाता है और एक लीटर एथेनॉल बनाने के लिए करीब 2.5 से 3 किलो चावल की जरूरत पड़ती है। इसी तरह, मक्का से एक लीटर एथेनॉल के लिए 4,670 लीटर और गन्ने से 3,630 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।
गरीबों की थाली से कटकर फैक्ट्रियों में जा रहा 'अनाज'
सरकार ने साल 2025-26 के लिए एथेनॉल उत्पादन हेतु 90 लाख टन चावल का लक्ष्य रखा है। इसके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत गरीबों को दिए जाने वाले टूटे चावल के कोटे को 25% से घटाकर 10% करने की योजना है, ताकि बचा हुआ अनाज सीधे एथेनॉल फैक्ट्रियों (डिस्ट्रिलरी) को भेजा जा सके।
किसान पर आरोप, लेकिन उद्योग को छूट?
'किसान तक' के संपादक ओम प्रकाश के हवाले से सूत्रों ने बताया कि जब एक किसान फसल उगाता है, तो उसे पानी बर्बाद करने का दोषी ठहराया जाता है। लेकिन जब उद्योग एक लीटर ईंधन के लिए 10,000 लीटर से ज्यादा पानी पी जाते हैं, तो उन्हें 'ग्रीन एनर्जी' का नाम देकर सराहना मिलती है। पंजाब और हरियाणा के किसानों को सालों तक भूजल कम करने के लिए कोसा गया, लेकिन अब उन्हीं फसलों का इस्तेमाल औद्योगिक स्तर पर ईंधन बनाने के लिए हो रहा है।
21 शहरों में शून्य हो जाएगा भूजल!
नीति आयोग के 'कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स' (CWMI) ने चेतावनी दी है कि 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई सहित देश के 21 बड़े शहरों में भूजल का स्तर शून्य हो सकता है। इसके बावजूद, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे जल-तनाव वाले राज्यों में एथेनॉल उत्पादन की क्षमता लगातार बढ़ाई जा रही है। महाराष्ट्र में जहाँ विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं, वहां एथेनॉल संयंत्रों की क्षमता 396 करोड़ लीटर तक पहुँच गई है।
इसके अतिरिक्त, इन संयंत्रों से निकलने वाला गंदा पानी (विनासे) भूजल और नदियों को भी प्रदूषित कर रहा है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
