क्यों बेटे मोजतबा को ईरान का सुप्रीम लीडर नहीं बनाना चाहते थे अली खामेनेई, वसीयत में जताई ये इच्छा
punjabkesari.in Wednesday, Mar 11, 2026 - 11:58 AM (IST)
इंटरनेशनल डेस्क : ईरान में नए सुप्रीम लीडर की नियुक्ति को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद सामने आया है। कई रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को देश का सर्वोच्च नेता बनाए जाने पर देश के अंदर और बाहर दोनों जगह सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह फैसला सामान्य प्रक्रिया के तहत नहीं लिया गया और इसमें ईरान की शक्तिशाली सैन्य संस्था की अहम भूमिका रही।
एयरस्ट्राइक में अली खामेनेई की मौत का दावा
कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की 28 फरवरी को एक एयरस्ट्राइक में मौत हो गई थी। हालांकि इस घटना को लेकर आधिकारिक स्तर पर बहुत कम जानकारी सामने आई है। इसके बाद ईरान में नए सुप्रीम लीडर के चयन की प्रक्रिया शुरू हुई।
रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि अली खामेनेई ने अपनी वसीयत में यह इच्छा जताई थी कि उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को उनका उत्तराधिकारी न बनाया जाए। कहा जाता है कि उन्हें अपने बेटे की राजनीतिक क्षमता और अनुभव को लेकर संदेह था।
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पिता को बेटे की योग्यता पर था संदेह
कुछ विश्लेषकों और ईरानी विपक्ष से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अली खामेनेई को लगता था कि मोजतबा खामेनेई के पास देश का नेतृत्व करने के लिए पर्याप्त अनुभव नहीं है। उनका मानना था कि मोजतबा एक युवा धर्मगुरु हैं, लेकिन उन्होंने राजनीति या प्रशासन में कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की है। विशेषज्ञों के मुताबिक, मोजतबा की पहचान लंबे समय तक मुख्य रूप से अपने पिता की वजह से ही बनी रही। इसी कारण कई लोग यह मानते हैं कि उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी देना उचित नहीं है।
सुप्रीम लीडर चुनने की प्रक्रिया क्या होती है
ईरान में सुप्रीम लीडर का चयन आमतौर पर असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स नाम की संस्था करती है। यह धार्मिक विद्वानों और वरिष्ठ धर्मगुरुओं की परिषद होती है, जिसका काम देश के सर्वोच्च नेता का चुनाव करना होता है। सामान्य तौर पर परिषद के सदस्य बैठक करते हैं, उम्मीदवारों पर चर्चा होती है और फिर मतदान के जरिए नया सुप्रीम लीडर चुना जाता है। लेकिन इस बार इस प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
नियुक्ति की प्रक्रिया पर लगे दबाव के आरोप
कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि मोजतबा खामेनेई की नियुक्ति सामान्य मतदान प्रक्रिया से नहीं हुई। आरोप है कि ईरान की शक्तिशाली सैन्य संस्था इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने इस मामले में दबाव डाला। कहा जा रहा है कि जब असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स इस मुद्दे पर चर्चा कर रही थी, तब IRGC ने परिषद पर दबाव बनाकर फैसला मोजतबा के पक्ष में करवाया। यह भी दावा किया गया है कि उन्हें परिषद में स्पष्ट बहुमत का समर्थन नहीं मिला था। कुछ सूत्रों के मुताबिक, कई धर्मगुरुओं ने इस बैठक का विरोध करते हुए उसका बहिष्कार भी किया था। उनका मानना था कि चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी।
‘कठपुतली नेता’ बनने का आरोप
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की सैन्य और सुरक्षा संस्थाएं मोजतबा खामेनेई को ऐसा नेता मानती हैं जिसे आसानी से प्रभावित किया जा सकता है। उनका दावा है कि इसी वजह से उन्हें इस पद पर लाने की कोशिश की गई, ताकि वास्तविक सत्ता पर सैन्य संस्थाओं का प्रभाव बना रहे। हालांकि इस तरह के आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना कठिन है।
अमेरिका की क्या प्रतिक्रिया रही?
मोजतबा खामेनेई के सुप्रीम लीडर बनने को लेकर अमेरिका की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस नियुक्ति पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ईरान को ऐसा नेता चुनना चाहिए जो क्षेत्र में शांति और स्थिरता ला सके। ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर ईरान में ऐसा नेता सत्ता में आता है जो पहले की कठोर नीतियों को ही जारी रखेगा, तो आने वाले वर्षों में तनाव और बढ़ सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे भविष्य में बड़े संघर्ष की स्थिति भी पैदा हो सकती है।
बिना सरकारी पद के बने सुप्रीम लीडर
मोजतबा खामेनेई की नियुक्ति को लेकर एक और चर्चा यह है कि उन्होंने पहले कभी कोई बड़ा सरकारी पद नहीं संभाला। उनका प्रभाव मुख्य रूप से अपने पिता के करीबी सहयोगी के रूप में काम करने से बढ़ा था। कई पुराने कूटनीतिक दस्तावेजों में उन्हें पर्दे के पीछे से प्रभाव रखने वाला व्यक्ति बताया गया था। कुछ आरोप यह भी लगे थे कि उन्होंने अतीत में ईरान के राष्ट्रपति चुनावों को प्रभावित करने में भूमिका निभाई थी, हालांकि इन आरोपों की पुष्टि नहीं हो पाई थी।
इजरायल की चेतावनी
इस बीच इजरायल की सेना ने भी चेतावनी दी है कि यदि ईरान का कोई भी नेता आतंकवाद से जुड़े अभियानों को आगे बढ़ाता है, तो उसे सुरक्षा खतरे के रूप में देखा जाएगा। इजरायल का कहना है कि वह अपने खिलाफ किसी भी गतिविधि को रोकने के लिए कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।
