डिलीवरी के ऑपरेशन में नहीं मिला बच्चा, सच्चाई जानकर सब रह गए हैरान
punjabkesari.in Thursday, Sep 03, 2026 - 10:13 PM (IST)
कराची : पाकिस्तान के कराची के एक अस्पताल में गर्भावस्था से जुड़ा हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां 9 महीने की गर्भवती महिला की डिलीवरी के लिए ऑपरेशन किया गया, लेकिन सर्जरी के दौरान उसके पेट में बच्चा ही नहीं मिला। हैरानी की बात यह है कि अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में महिला की करीब 38 हफ्ते की प्रेग्नेंसी बताई गई थी। मामला सामने आने के बाद परिवार ने अस्पताल पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
हालांकि, इस घटना ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर डिलीवरी के ऑपरेशन से पहले डॉक्टर किन जांचों और क्लिनिकल चेकअप के जरिए यह पुष्टि करते हैं कि महिला वास्तव में गर्भवती है और गर्भ में बच्चा सुरक्षित है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस जांच में सामने आया कि महिला ने अपनी प्रेग्नेंसी की फर्जी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट तैयार करवाई थी। जांच में यह भी पता चला कि महिला वास्तव में गर्भवती नहीं थी। बताया गया कि परिवार की ओर से उस पर बच्चा कंसीव करने का दबाव था, जिसके चलते उसने कथित तौर पर यह फर्जी रिपोर्ट बनवाई।
डिलीवरी से पहले कौन-कौन सी जांच जरूरी?
गुरुग्राम स्थित फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की डायरेक्टर डॉ. नूपुर गुप्ता के मुताबिक, जब कोई महिला डिलीवरी के लिए अस्पताल पहुंचती है तो डॉक्टर सबसे पहले उसकी पिछली मेडिकल रिपोर्ट और अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट देखते हैं।
डॉक्टर यह पता करते हैं कि गर्भावस्था कितने सप्ताह की है, गर्भ में बच्चे की स्थिति क्या है और बच्चे की हार्टबीट कैसी है। अगर पुरानी मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध नहीं हैं या बच्चे की स्थिति को लेकर किसी तरह का संदेह है, तो महिला की स्थिति के अनुसार जरूरी जांच कराई जाती है। जरूरत पड़ने पर डिलीवरी से पहले उसी समय अल्ट्रासाउंड भी किया जा सकता है। खासकर तब, जब डॉक्टर को बच्चे की पोजिशन, प्लेसेंटा या गर्भावस्था की स्थिति को लेकर कोई चिंता हो।
सिर्फ पुराने अल्ट्रासाउंड के आधार पर ऑपरेशन कितना सही?
पाकिस्तान के मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर महिला वास्तव में गर्भवती नहीं थी, तो केवल पुरानी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट के आधार पर उसका ऑपरेशन कैसे कर दिया गया? डॉ. नूपुर गुप्ता के अनुसार, गर्भावस्था के आखिरी महीनों में बच्चे की स्थिति और उसकी सेहत का आकलन करने के लिए सिर्फ एक पुराना अल्ट्रासाउंड पर्याप्त नहीं माना जाता। डॉक्टर बच्चे की हार्टबीट की भी जांच करते हैं। जरूरत के अनुसार डॉप्लर या इलेक्ट्रॉनिक फीटल मॉनिटरिंग जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
NICE की गाइडलाइन के मुताबिक, लेबर के दौरान कुछ विशेष परिस्थितियों में लगातार CTG (कार्डियोटोकोग्राफी) मॉनिटरिंग की जरूरत पड़ सकती है। इसमें बच्चे की हार्ट रेट और गर्भाशय की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है।
क्या ऑपरेशन से ठीक पहले अल्ट्रासाउंड किया जाता है?
कुछ परिस्थितियों में सी-सेक्शन से पहले अल्ट्रासाउंड किया जा सकता है। खासकर तब, जब बच्चे की पोजिशन, प्लेसेंटा या गर्भावस्था की स्थिति को लेकर कोई सवाल हो। NICE की गाइडलाइन के अनुसार, अगर बच्चा ब्रीच प्रेजेंटेशन यानी उल्टी स्थिति में है, तो सी-सेक्शन से पहले संभव हो तो ऑपरेशन के जितना करीब हो सके, अल्ट्रासाउंड के जरिए बच्चे की पोजिशन की पुष्टि की जानी चाहिए।
