सऊदी पर ईरानी हमलों बाद भी पाकिस्तान चुप ! क्या दे रहा दुश्मनों का साथ, डिफेंस पेक्ट पर उठे सवाल
punjabkesari.in Thursday, Mar 19, 2026 - 02:02 PM (IST)
International Desk:मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ रक्षा समझौता अब सवालों के घेरे में आ गया है। एक समय जिस समझौते को “मजबूत रणनीतिक साझेदारी” बताया गया था, वही अब जमीनी हकीकत में कमजोर दिख रहा है। Shehbaz Sharif और Mohammed bin Salman के बीच हुआ यह समझौता इस आधार पर था कि किसी एक देश पर हमला, दोनों पर हमला माना जाएगा। इसे NATO जैसे मॉडल की तरह पेश किया गया था। लेकिन 28 फरवरी 2026 को जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमले किए और ईरान ने जवाब में सऊदी अरब समेत खाड़ी देशों को निशाना बनाया, तब इस समझौते की असली परीक्षा हुई।
पाकिस्तान चुप क्यों ?
इस बड़े संकट के बावजूद पाकिस्तान ने सऊदी अरब के समर्थन में कोई खुली सैन्य कार्रवाई नहीं की। इससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह गठबंधन सिर्फ कागजों तक ही सीमित था?असल में पाकिस्तान इस समय अपनी पश्चिमी सीमा पर व्यस्त है, जहां Afghanistan के साथ तनाव बढ़ा हुआ है। वहां सैन्य ऑपरेशन तेज हो गए हैं और लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। पाकिस्तान सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए उसे घरेलू हालात को प्राथमिकता देनी पड़ रही है।
वायदे बनाम हकीकत
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान ने जानबूझकर संतुलित रुख अपनाया है। एक तरफ वह सऊदी अरब के साथ रिश्ते बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ खुला टकराव भी नहीं चाहता। यही कारण है कि पाकिस्तान की भूमिका अब “सक्रिय सहयोगी” के बजाय “सावधान पर्यवेक्षक” जैसी दिख रही है।
सऊदी अरब के लिए क्या मतलब?
सऊदी अरब ने इस समझौते में काफी निवेश किया था और इसे अपनी सुरक्षा का मजबूत स्तंभ माना था। लेकिन मौजूदा हालात में उसे अब अपने रक्षा विकल्पों पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है खासतौर पर पश्चिमी देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की दिशा में। इस पूरे घटनाक्रम का असर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ सकता है। अन्य देश अब उसके रक्षा समझौतों पर भरोसा करने से पहले सोच सकते हैं। उसकी रणनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।
यह घटना एक बड़ा सबक देती है कि अंतरराष्ट्रीय गठबंधन केवल घोषणाओं से मजबूत नहीं होते। असली ताकत तब दिखती है जब संकट के समय सहयोगी देश साथ खड़े हों। फिलहाल, मिडिल ईस्ट की जंग ने यह साफ कर दिया है कि सऊदी-पाकिस्तान रक्षा साझेदारी की असली परीक्षा अभी जारी है और दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं।
