अरब लीग प्रमुख का बड़ा बयानः “यूक्रेन युद्ध में रूस को कोई नहीं हरा सकता”, नाटो पर भी की गंभीर ऐतिहासिक टिप्पणी
punjabkesari.in Saturday, Jan 31, 2026 - 01:18 PM (IST)
International Desk: यूक्रेन युद्ध और वैश्विक शक्ति संतुलन पर एक अहम टिप्पणी करते हुए अरब लीग के महासचिव अहमद अबूल गैट ने कहा है कि यूक्रेन में रूस को सैन्य रूप से पराजित करना संभव नहीं है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि शीत युद्ध के दौर में भी विश्व की बड़ी शक्तियों ने परमाणु टकराव से बचने के लिए संतुलन बनाए रखा था, और आज की वैश्विक राजनीति भी उसी सच्चाई से बंधी हुई है। शुक्रवार को भारतीय विश्व मामलों की परिषद (ICWA) द्वारा आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बोलते हुए, अबूल गैट ने कहा, “शीत युद्ध के चरम समय में भी रूस, अमेरिका और चीन ने सीधे टकराव से परहेज़ किया, क्योंकि ऐसा होने पर परमाणु हथियार सक्रिय हो जाते। आज भी वही वास्तविकता कायम है।”
"No one can defeat Russia in Ukraine": Arab League chief Ahmed Aboul Gheit
— ANI Digital (@ani_digital) January 31, 2026
Read @ANI Story | https://t.co/EL24fcGWkK
#ArabLeagueChief #AhmedAboulGheit #Russia #Ukraine pic.twitter.com/Dt3zGxIbyH
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “रूस अपनी सैन्य और रणनीतिक क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है। यूक्रेन में रूस को कोई पराजित नहीं कर सकता।” अफगानिस्तान और यूक्रेन की तुलना अपने तर्क को ऐतिहासिक उदाहरणों से स्पष्ट करते हुए अरब लीग प्रमुख ने कहा कि “आप अफगानिस्तान में रूस को हरा सकते थे, क्योंकि वह मॉस्को से 11,000 मील दूर था। लेकिन यूक्रेन रूस के रणनीतिक और भौगोलिक केंद्र से जुड़ा हुआ है।” उनका इशारा इस ओर था कि रूस के लिए यूक्रेन केवल एक युद्धक्षेत्र नहीं, बल्कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा है। अबूल गैट ने मौजूदा भू-राजनीतिक समीकरणों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अमेरिका की कोशिश है कि रूस को चीन से अलग किया जाए, ताकि वैश्विक शक्ति संतुलन में बीजिंग को अकेला किया जा सके। “अमेरिका यह समझता है कि रूस-चीन की नजदीकी उसके दीर्घकालिक हितों के लिए चुनौती है।”
अरब लीग प्रमुख ने 1990 के दशक का हवाला देते हुए कहा कि सोवियत संघ के पतन के बाद एक समय ऐसा भी था, जब रूस नाटो में शामिल होने की संभावना तलाश रहा था। उन्होंने बताया कि 1993–94 में व्लादिमीर पुतिन के उदय के शुरुआती दौर और राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन के कार्यकाल में रूस ने नाटो से सहयोग बढ़ाने की कोशिश की। येल्तसिन ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को चेताया था कि नाटो का पूर्व की ओर विस्तार शीत युद्ध के बाद बनी सहमति की भावना के खिलाफ है।1994 में ‘पार्टनरशिप फॉर पीस’ कार्यक्रम शुरू हुआ, जिसमें रूस भी शामिल हुआ, यह उम्मीद करते हुए कि यह या तो नाटो की सदस्यता का रास्ता बनेगा या विस्तार का विकल्प होगा।हालांकि, जब इसी कार्यक्रम के ज़रिए पोलैंड, हंगरी और चेक गणराज्य जैसे देशों को नाटो में शामिल किया गया, तो रूस ने 1995 के बाद नाटो विस्तार का खुला विरोध शुरू कर दिया।
अबूल गैट ने कहा कि 1997 में नाटो-रूस फाउंडिंग एक्ट पर हस्ताक्षर हुए, जिससे एक समय के लिए सहयोग की उम्मीद जगी। लेकिन बाद के वर्षों में नाटो के निरंतर विस्तार और यूरोपीय सुरक्षा ढांचे में रूस की अनदेखी ने संबंधों को टकराव की दिशा में धकेल दिया। उन्होंने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि आज रूस का आक्रामक रुख उसी टूटे हुए विश्वास और बदले हुए भू-राजनीतिक माहौल का परिणाम है।अरब लीग प्रमुख के अनुसार, यूक्रेन युद्ध को केवल सैन्य चश्मे से देखना एक भूल होगी। यह संघर्ष शीत युद्ध के बाद बने वैश्विक व्यवस्था के टूटने, नाटो विस्तार और महाशक्तियों के बीच नए संतुलन की लड़ाई का प्रतीक है जिसमें रूस को पराजित करने की कल्पना, व्यावहारिक हकीकत से दूर है।
