Iran-Israel War: कभी 'जिगरी दोस्त' रहे ये देश, आखिर कैसे बने एक-दूसरे के खून के प्यासे? जानें पूरी इनसाइड स्टोरी!
punjabkesari.in Saturday, Feb 28, 2026 - 01:12 PM (IST)
Iran-Israel War: आज मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) का आसमान मिसाइलों और लड़ाकू विमानों की गर्जना से दहला हुआ है। ईरान और इज़रायल, जो कभी एक-दूसरे के रणनीतिक साझेदार हुआ करते थे, आज युद्ध की कगार पर खड़े हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 1979 से पहले इज़रायल, ईरान को हथियार सप्लाई करता था? आखिर ऐसा क्या हुआ कि 'दोस्त' रातों-रात 'जानी दुश्मन' बन गए?
हालिया घटनाक्रमों की बात करें तो इजराइल ने शनिवार 28 फरवरी को ईरान पर जवाबी मिसाइल हमला किया, जिससे तेहरान में जोरदार धमाके हुए। यह हमला परमाणु समझौते को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और व्यापक सैन्य टकराव की आशंकाओं के बीच हुआ है। रॉयटर्स ने स्थानीय मीडिया के हवाले से बताया कि कई मिसाइलें तेहरान के यूनिवर्सिटी स्ट्रीट और जोम्हूरी इलाके में गिरीं, जबकि शहर के डाउनटाउन इलाके में पाश्चर स्ट्रीट के पास धुएं के घने गुबार उठते देखे गए।

इससे पहले 13 जून को इजरायल द्वारा ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर किया गया 'ऑपरेशन राइजिंग लॉयन' इस शत्रुता का एक नया और घातक अध्याय है। इस हमले से पहले इजरायल ने बाकायदा तेहरान खाली करने की चेतावनी दी थी, जिसके जवाब में ईरान ने 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3' के तहत इजरायल पर 100 से अधिक मिसाइलें दागीं। इस संघर्ष में ईरान के 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) के कमांडर हुसैन सलामी और कई परमाणु वैज्ञानिकों की मौत ने आग में घी डालने का काम किया है।

कभी 'जिगरी दोस्त' रहे ये दोनों देश
हैरानी की बात यह है कि 1948 में जब इजरायल का जन्म हुआ, तब ईरान उन शुरुआती मुस्लिम बहुल देशों में से एक था जिसने इजरायल के साथ संबंध बनाए रखे थे। उस दौर में ईरान पर शाह मोहम्मद रेजा पहलवी का शासन था। शाह के समय में ईरान और इजरायल के बीच की नजदीकी का मुख्य कारण 'साझा दुश्मन' (अरब देश) थे। इजरायल के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन ने 'पेरिफेरी डॉक्ट्रिन' की नीति अपनाई थी, जिसका उद्देश्य अरब देशों के घेराव से बचने के लिए गैर-अरब पड़ोसियों (जैसे ईरान और तुर्की) से दोस्ती करना था। उस समय ईरान, इजरायल को तेल की आपूर्ति करता था और बदले में इजरायल उसे हथियार और तकनीक देता था। चूंकि शाह के संबंध अमेरिका और पश्चिमी देशों से बेहद मजबूत थे, इसलिए ईरान और इजरायल एक ही पाले में खड़े थे।
दोस्ती का दौर खत्म: 1979 की इस्लामिक क्रांति ने बदल दी द्विपक्षीय नीतियां
इन दोनों देशों के बीच दोस्ती का यह सुनहरा दौर 1979 की 'इस्लामिक क्रांति' के साथ हमेशा के लिए खत्म हो गया। शाह के पतन के बाद जब अयातुल्लाह रूहोल्लाह खोमेनी के नेतृत्व में 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान' की स्थापना हुई, तो विदेश नीति पूरी तरह बदल गई। नई सरकार ने इजरायल को एक अवैध राष्ट्र और फिलिस्तीनी जमीन पर कब्जा करने वाला देश घोषित कर दिया। खोमेनी ने अमेरिका को 'बड़ा शैतान' और इजरायल को 'छोटा शैतान' करार दिया। ईरान का मानना था कि ये दोनों शक्तियां मिडिल ईस्ट के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप कर रही हैं। यहीं से वैचारिक और रणनीतिक दुश्मनी की नींव पड़ी।

छद्म युद्ध (Proxy War) और परमाणु विवाद
क्रांति के बाद के दशकों में ईरान ने मिडिल ईस्ट में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इजरायल विरोधी गुटों का समर्थन करना शुरू किया। इजरायल लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि ईरान गाजा में 'हमास' और लेबनान में 'हिज्बुल्लाह' जैसे संगठनों को हथियार और पैसा मुहैया कराता है ताकि इजरायल को अस्थिर किया जा सके। दूसरी ओर, इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा माना है। 2010 के आसपास से ही इजरायल ने ईरान के भीतर कई गुप्त ऑपरेशन चलाए हैं, जिनमें परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या और साइबर हमले शामिल रहे हैं। इजरायल का स्पष्ट तर्क है कि वह ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
