इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में कनाडा-भारत साथ, कनाडाई सिखों को सता रही इस बात की चिंता

punjabkesari.in Friday, Dec 09, 2022 - 12:33 PM (IST)

इंटरनेशनल डेस्क: कनाडा ने अपनी नई हिंद-प्रशांत रणनीति दस्तावेज में भारत के साथ सहयोग बढ़ाने की योजना पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। जिसमें भारत के साथ एक नए व्यापार समझौते की दिशा में काम करने की प्रतिबद्धता शामिल है, रणनीतिक, जनसांख्यिकीय क्षेत्र, आर्थिक क्षेत्र में नई दिल्ली के बढ़ते महत्व को दिखाता है। 26 पन्नों के इस दस्तावेज में चीन के दखल पर भारत का साथ देने की बात कही गई है। वहीं कनाडा के विश्व सिख संगठन ने कनाडा सरकार द्वारा अपनी इंडो-पैसिफिक रणनीति के लॉन्च के मद्देनजर भारत द्वारा विदेशी हस्तक्षेप और दबाव बढ़ने की आशंका जताई है। 

 

हिंद-प्रशांत रणनीति 

कनाडा ने पिछले महीने (27 नवंबर) को  हिंद-प्रशांत रणनीति शुरू की थी। कनाडा की हिंद-प्रशांत रणनीति के तहत भारत को एक 'महत्वपूर्ण भागीदार' करार दिया गया। कनाडा का प्रमुख जोर लोगों से लोगों के बीच संबंध बनाने, नई दिल्ली और चंडीगढ़ में वीजा-प्रसंस्करण क्षमता को मजबूत करने के साथ-साथ भारत के साथ शैक्षणिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, युवा और अनुसंधान आदान-प्रदान में अधिक निवेश करने पर है। इसमें अगले पांच वर्षों में 2.3 बिलियन डॉलर का निवेश शामिल है। इससे पहले कनाडा ने भारत के साथ एक विस्तारित हवाई परिवहन समझौते की घोषणा की, जिससे निर्दिष्ट एयरलाइनों को दोनों देशों के बीच असीमित संख्या में उड़ानें संचालित करने की अनुमति मिली।

 

जानिए क्या बोले भारत के नवनियुक्त उच्चायुक्त

कनाडा में सिखों को हाशिए पर रखने और चुप कराने के उद्देश्य से भारत द्वारा बढ़ते हस्तक्षेप पर फिलहाल सिख समुदाय अभी शांत है। वहीं कनाडा की इंडो-पैसिफिक रणनीति की घोषणा के तुरंत बाद, कनाडा में भारत के नवनियुक्त उच्चायुक्त, संजय कुमार वर्मा ने कहा कि कनाडा को "कनाडा में सिख समुदाय के उन हिस्सों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए जो अलगाववादियों को समर्थन और पंडिंग की पेशकश कर रहे हैं और पंजाब को भारत से अलग करना चाहते हैं। हालांकि वर्मा ने अपने आरोप को साबित करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं किया कि इस तरह की फंडिंग वास्तव में हो रही है।

 

कनाडा और भारत के बीच एक दशक से अधिक समय तक लगभग हर द्विपक्षीय बैठक के दौरान, भारतीय अधिकारियों ने कनाडाई सिख समुदाय में कथित चरमपंथी गतिविधि और "खालिस्तान समर्थक कट्टरपंथ" पर चिंता जताई है, भारत अक्सर यह मुद्दा उठाता भी रहा है। कनाडा में खालिस्तान के विचार और सिद्धांत काफी फल-फूल रहे हैं, वहीं कनाडा सरकार का कहना है कि उसके देश में किसी भी व्यक्ति को अपने विचार रखने की आजादी है। 

 

अभी पिछले महीने, भारत सरकार ने मांग की थी कि कनाडा खालिस्तान पर एक गैर-बाध्यकारी जनमत संग्रह करा रहे संगठन पर प्रतिबंध लगाकर और मतदान होने से रोककर खालिस्तान के एक संप्रभु राज्य की वकालत करने वाले सिखों पर कार्रवाई करे। भारतीय दबाव के बावजूद, यह बताया गया कि ब्रैम्पटन में 18 सितंबर, 2022 और 6 नवंबर, 2022 को मिसिसॉगा में जनमत संग्रह में 100,000 से अधिक सिखों ने भाग लिया। हालांकि भारत के दवाब के बाद कनाडा के उप विदेश मंत्री डेविड मॉरिसन की तरफ से बयान आया था कि हम भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करता है और अनौपचारिक जनमत संग्रह को मान्यता या समर्थन नहीं देते।

 

भारत ने बनाया कनाडा पर दवाब

भारत ने बार-बार सिख वकालत को चुप कराने के लिए कनाडा पर दबाव डालने की कोशिश की है और संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस और जैसे अन्य देशों के लिए ई-वीजा प्रणाली उपलब्ध होने के बावजूद भारत आने के इच्छुक कनाडाई नागरिकों के लिए ई-वीजा के निरंतर निलंबन जैसी रणनीति का इस्तेमाल किया है। भारतीय वीजा के लिए आवेदन करने वाले कनाडाई नागरिकों के लिए प्रतीक्षा समय वर्तमान में चार से छह सप्ताह है। अधिकांश अन्य देशों के नागरिकों के लिए बहाल किए जाने के बावजूद कनाडा के नागरिकों को पूर्व में जारी किए गए दस-वर्षीय वीजा भी निलंबित रहेंगे।


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Content Writer

Seema Sharma

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