मेरे लिए सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, लोगों को एक साथ लाने का जरिया है: इम्तियाज अली

punjabkesari.in Wednesday, Jun 10, 2026 - 12:08 PM (IST)

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। 12 जून को सिनेमाघरों मे रिलीज होने जा रही है इम्तियाज अली द्वारा डायरेक्टेड फिल्म 'मैं वापस आऊंगा'। फिल्म में कई मंझे हुए कलाकार नजर आने वाले हैं तो कई फ्रेश फेस भी देखने को मिलेंगे। अगर फिल्म की स्टारकास्ट की बात करें तो फिल्म में वेदांग रैना, शर्वरी वाघ, दिलजीत दोसांझ और नसीरुद्दीन शाह नजर आने वाले हैं। फिल्म में ए. आर रहमान ने म्यूजिक दिया है। फिल्म के बारे में कास्ट वेदांग रैना, शर्वरी वाघ और डायरेक्टर इम्तियाज अली ने पंजाब केसरीनवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...

वेदांग रैना

सवाल: फिल्म में पहली बार पगड़ी पहनने का अनुभव कैसा रहा?

हर सुबह जब मैं तैयार होता था तो सिमरन पाजी मुझे पगड़ी पहनाते थे। वह अनुभव मेरे लिए मेडिटेशन जैसा था। पगड़ी पहनते समय मैं अक्सर आंखें बंद कर लेता था और एक अलग ही ज़ोन में चला जाता था। ऐसा लगता था कि मैं वेदांग से कीनू बन गया हूं। इसके अलावा पगड़ी में एक अलग तरह की शक्ति और आध्यात्मिकता महसूस होती है, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।

सवाल: दिलजीत दोसांझ और नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

बहुत बड़ी जिम्मेदारी महसूस हुई। खासकर मेरे लिए क्योंकि मैं नसीरुद्दीन शाह साहब का युवा किरदार निभा रहा हूं। मैंने उनके मास्टरक्लास वीडियो देखकर बहुत कुछ सीखा है, इसलिए यह मौका मेरे लिए किसी सपने के सच होने जैसा था।

सवाल: आपके लिए ज्यादा बड़ा अनुभव क्या रहा- फिल्म में अभिनय करना या ए.आर. रहमान के संगीत पर गाना गाना?

दोनों ही मेरे लिए बेहद खास अनुभव रहे, लेकिन अगर दिल की बात कहूं तो ए.आर. रहमान सर के संगीत पर काम करना मेरा बहुत पुराना सपना था। अभिनय के बारे में सोचने से पहले ही मैं संगीत से जुड़ा हुआ था। रहमान सर का मैं बचपन से बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं। इसलिए उनके साथ काम करना मेरे लिए किसी सपने के सच होने जैसा है।

सवाल: आज की युवा पीढ़ी पार्टिशन की कहानियों से पहले की तुलना में कम जुड़ी हुई नजर आती है। क्या आपको ऐसा लगता है?

मुझे ऐसा नहीं लगता कि आज की पीढ़ी इतिहास से दूर है। हां, हमारे पास वह अनुभव नहीं है जो हमारे दादा-दादी या माता-पिता के पास था, लेकिन हमारी पीढ़ी बेहद जिज्ञासु है। हम जानना चाहते हैं कि आखिर उस दौर में क्या हुआ था। मैंने इस फिल्म के लिए पार्टिशन म्यूज़ियम जाकर रिसर्च की, लोगों की कहानियां सुनीं। उन अनुभवों ने मुझे भीतर तक प्रभावित किया। दर्द आज भी उतना ही वास्तविक लगता है, चाहे उसे महसूस करने का तरीका बदल गया हो।

शर्वरी वाघ

सवाल: शूटिंग से पहले आपने पार्टिशन को समझने के लिए क्या तैयारी की थी?

मैं और वेदांग इम्तियाज सर के साथ पंजाब आए थे और सबसे पहले Partition Museum गए। हम वहां रिसर्च के लिए गए थे लेकिन बाहर निकलते समय हमारी सोच पूरी तरह बदल चुकी थी। विभाजन हमारे इतिहास का बहुत बड़ा हिस्सा है और हमें एहसास हुआ कि हम ऐसी कहानी का हिस्सा बनने जा रहे हैं जो लाखों लोगों की वास्तविक यादों से जुड़ी हुई है। इसलिए इस विषय को संवेदनशीलता के साथ पेश करना बहुत जरूरी था।

सवाल: जब आपको पता चला कि आप इम्तियाज अली की फिल्म का हिस्सा हैं तब कैसा लगा?

मैं हमेशा से उनके साथ काम करना चाहती थी। जब पहली बार उनसे मिली, तब फिल्मों से ज्यादा खाने पर बातें हुईं। बाद में उन्होंने मुझे कहानी सुनाई और जब आखिरकार फिल्म का हिस्सा बनी, तो बहुत खुशी हुई। असली एहसास तब हुआ जब टीज़र में आखिर में ‘An Imtiaz Ali Film’ लिखा देखा। तब लगा कि मैं सच में इस फिल्म का हिस्सा हूं।

सवाल: आपने कई नामी निर्देशकों के साथ काम किया है तो अब इम्तियाज अली के साथ काम करने का अनुभव कितना अलग रहा?

असल में, सिनेमा के लिए जो जुनून होता है वह इन सभी निर्देशकों में समान रूप से दिखाई देता है। चाहे आप असिस्टेंट डायरेक्टर हों या अभिनेता आप सेट पर अपने निर्देशक से बहुत कुछ सीखते हैं। वही फिल्म के कप्तान होते हैं और उनकी ऊर्जा पूरी टीम तक पहुंचती है। जब आप रोज़ सेट पर आते हैं तो एक प्रेरणा होती है कि आज कुछ अच्छा करना है, फिल्म के लिए योगदान देना है। मैंने इन सभी निर्देशकों में सिनेमा के प्रति जो समर्पण देखा है, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। लेकिन मैं उम्मीद करती हूं कि उनकी वह आग और वह जुनून मैं भी अपने भीतर हमेशा जिंदा रख सकूं।

सवाल: पंजाब की कोई याद जो आपके दिल के करीब हो?

मैं और वेदांग स्वर्ण मंदिर गए थे और करीब चार घंटे वहां बैठे रहे। हमने सूर्यास्त देखा और काफी देर तक खामोशी में उस माहौल को महसूस किया। वह अनुभव बहुत सुकून देने वाला था।

वेदांग रैना: मैं पहली बार स्वर्ण मंदिर गया था। वहां जो शांति और ऊर्जा महसूस हुई, उसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता। हमने वहीं से कड़े भी खरीदे थे और आज भी मैं वही कड़ा पहनता हूं।

इम्तियाज अली

सवाल: 'मैं वापस आऊंगा' का ट्रेलर काफी फ्रेश और अलग नजर आता है। आपने इस फिल्म के लिए युवा कलाकारों को चुनने का फैसला क्यों किया?

यह पूरी तरह एक लॉजिकल फैसला था। देश के विभाजन को करीब 78 साल हो चुके हैं। अगर उस दौर की कहानी को ऐसे व्यक्ति के नजरिए से दिखाना है जो आज भी जीवित हो सकता है, तो पात्रों की उम्र उसी हिसाब से तय करनी पड़ती है। इसके अलावा मुझे आज की युवा पीढ़ी के कलाकार बेहद दिलचस्प लगते हैं। उनकी सोच पहले के कलाकारों से अलग है। उनमें ग्लैमर से ज्यादा अभिनय को लेकर जुनून दिखाई देता है। यही बात मुझे उनके साथ काम करने के लिए प्रेरित करती है।

सवाल: आपकी फिल्मों के किरदार इतने अलग-अलग लोगों से जुड़ जाते हैं। आखिर उनमें ऐसा क्या होता है?

मुझे लगता है कि हम अपने आसपास के लोगों से ही किरदारों को जन्म देते हैं। उदाहरण के लिए 'जब वी मेट' की गीत को ही ले लीजिए। वह किसी एक लड़की पर आधारित नहीं थी, बल्कि मैंने कई ऐसी लड़कियों को देखकर उस किरदार को गढ़ा था जिनके भीतर कुछ अलग करने का जज़्बा था। इसी तरह इस फिल्म की जिया भी कई लड़कियों की भावनाओं और अनुभवों का मिश्रण है। दर्शक अपने जीवन की झलक इन किरदारों में देखते हैं और शायद इसी वजह से उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं।

सवाल: क्या आपको लगता है कि फिल्म देखने के बाद युवा दर्शकों में पार्टिशन के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ेगी?

बिल्कुल। मेरा मानना है कि किसी भी विषय को जानने के लिए सबसे जरूरी चीज़ है दिलचस्पी। आज जानकारी हासिल करना पहले से कहीं ज्यादा आसान है। अगर किसी युवा को किसी विषय में रुचि पैदा हो जाए तो वह कुछ ही मिनटों में उसके बारे में बहुत कुछ जान सकता है। मुझे उम्मीद है कि यह फिल्म दर्शकों के भीतर इतिहास को लेकर वही जिज्ञासा पैदा करेगी।

सवाल: सिनेमा हॉल में अलग-अलग वर्ग, उम्र और सोच के लोग बैठते हैं, लेकिन फिर भी सभी एक ही कहानी से जुड़ जाते हैं। आप इसे कैसे देखते हैं?

यही सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत है। समाज में लोग अलग-अलग विचारधाराओं, वर्गों और पृष्ठभूमियों से आते हैं। कई बार वे एक-दूसरे से सहमत भी नहीं होते, लेकिन जब वे एक साथ बैठकर कोई फिल्म देखते हैं तो एक साझा अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं। यह सामूहिक अनुभव लोगों को जोड़ता है। मेरे लिए सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि लोगों को एक साथ लाने का माध्यम भी है।

सवाल: आपकी फिल्मों में संगीत हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस बार ए.आर. रहमान के साथ काम करने की खास वजह क्या रही?

इस फिल्म की कहानी 1947 के दौर में स्थापित है। उस समय पंजाब में पश्चिमी संगीत का भी काफी प्रभाव था। मैं उस दौर के लोक संगीत और वेस्टर्न म्यूजिक के मेल को तलाशना चाहता था। ऐसे प्रयोगों के लिए रहमान सर से बेहतर कोई नहीं हो सकता। उनकी संगीत की समझ और प्रयोगधर्मिता इस फिल्म की जरूरत के बिल्कुल अनुरूप थी।

सवाल: आपने ए.आर. रहमान को फिल्म की कहानी कब सुनाई?
मैंने उन्हें शुरुआत में ही कहानी का एक हिस्सा सुनाया था। मेरे लिए संगीत और कहानी हमेशा साथ-साथ चलते हैं। फिल्म में गाने सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं आते, बल्कि कहानी को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। इसलिए संगीत निर्देशक को शुरुआत से ही कहानी की दुनिया में शामिल करना जरूरी होता है।

सवाल: आपने अपनी फिल्मों के जरिए भारत के कई खूबसूरत हिस्सों को दिखाया है। ऐसी कौन-सी जगहें हैं जिन्हें हर किसी को जरूर देखना चाहिए?

अगर तीन जगहों की बात करूं तो सबसे पहले कश्मीर, फिर हिमाचल प्रदेश और उसके बाद राजस्थान। हालांकि सच कहूं तो भारत की खूबसूरती इतनी विशाल है कि सिर्फ तीन जगहों तक उसे सीमित करना मुश्किल है। देश का लगभग हर हिस्सा अपने भीतर एक अलग कहानी समेटे हुए है।

सवाल: क्या भविष्य में आपको किसी एक्शन फिल्म का निर्देशन करते हुए देखा जा सकता है?
क्यों नहीं? मैं अलग-अलग शैलियों में काम करने के लिए हमेशा उत्सुक रहता हूं। हालांकि मेरी पहचान प्रेम कहानियों से बनी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं खुद को सिर्फ उसी तक सीमित रखूं। अगर कोई अच्छी एक्शन कहानी मिली तो जरूर उस दिशा में भी काम करूंगा।


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Content Editor

Mansi

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