ब्राउन सिर्फ क्राइम थ्रिलर नहीं, इंसानी फितरत की परतें खोलती है: अभिनय देव

punjabkesari.in Friday, Jun 26, 2026 - 11:33 AM (IST)

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। कोलकाता की रहस्यमयी और बेचैन कर देने वाली पृष्ठभूमि पर आधारित क्राइम थ्रिलर सीरीज ब्राउन को जी5 पर रिलीज के बाद से ही दर्शकों का अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। सीरीज एक हाई-प्रोफाइल मर्डर केस की कहानी पेश करती है। जिसकी जांच की जिम्मेदारी करिश्मा कपूर को सौंपी जाती है। सीरीज का निर्देशन अभिनय देव ने किया है सीरीज के बारे में डायरेक्टर ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...

सवाल: आज के ओटीटी दौर में, जहां कंटेंट बहुत जल्दी आता और चला जाता है ब्राउन को लेकर दर्शकों में उत्सुकता बनाए रखने के लिए क्या रणनीति है?

मैं कहना चाहूंगा कि ‘ब्राउन’ सिर्फ एक क्राइम थ्रिलर नहीं है। यह ऐसी कहानी है जो आपको सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे आसपास मौजूद लोग वास्तव में कैसे हैं। आज के समय में मुझे लगता है कि ब्लैक और व्हाइट जैसी कोई चीज बची ही नहीं है। हम सब किसी न किसी तरह ग्रे हो चुके हैं। सवाल सिर्फ इतना है कि आप ग्रे के किस शेड में आते हैं। यह सीरीज उसी मानवीय जटिलता की पड़ताल करती है। क्राइम इसकी रीढ़ जरूर है, लेकिन इसके अलावा इसमें इंसानी व्यवहार, रिश्ते, समाज और नैतिकता की कई परतें हैं। यह सीरीज अपराधियों से ज्यादा इंसानों का अध्ययन करती है।


सवाल: आज दर्शक सीधे अच्छे-बुरे किरदारों से आगे बढ़ चुके हैं। क्या ‘ब्राउन’ उन्हें यह तय करने का मौका देती है कि कौन सही है और कौन गलत?

बिल्कुल। हम सिर्फ दर्शकों से यह नहीं कह रहे कि आप फैसला कीजिए। हम उन्हें एक अनुभव दे रहे हैं, जहां वे खुद सोचें कि उनके आसपास मौजूद लोग वास्तव में कौन हैं।
क्या आपके साथ रोज बस में सफर करने वाला व्यक्ति उतना ही साधारण है जितना वह दिखाई देता है? या उसके भीतर कुछ और भी है? यह सीरीज ऐसे ही सवाल खड़े करती है।

सिनेमा और कहानियों की ताकत यही है कि वे आपको सिर्फ मनोरंजन ही नहीं देतीं, बल्कि सोचने पर भी मजबूर करती हैं। ‘ब्राउन’ एक प्याज की तरह है जिसकी परतें धीरे-धीरे खुलती हैं। सातवें एपिसोड तक पहुंचते-पहुंचते आप खुद से सवाल करने लगेंगे कि आखिर यह कहानी आप पर इतना असर क्यों डाल रही है।

सवाल: आपने कहा कि यह सिर्फ लोगों की नहीं बल्कि शहर की भी कहानी है। कोलकाता इस सीरीज में कितना महत्वपूर्ण है?

मेरे लिए कोलकाता सिर्फ एक लोकेशन नहीं बल्कि इस सीरीज का एक किरदार है। हमारे देश में बहुत कम शहर बचे हैं जहां आपको एक ही टेबल पर चीनी, एंग्लो-इंडियन, मारवाड़ी, बिहारी, यूपी के लोग और बंगाली साथ बैठकर खाना खाते हुए मिल जाएं। कोलकाता संस्कृति, साहित्य, संगीत, इतिहास और विरासत से भरा हुआ शहर है।

लेकिन साथ ही यह एक ऐसा शहर भी है जो धीरे-धीरे टूट रहा है, बिखर रहा है। जैसे हमारे देश के कई अन्य शहर। इसलिए यह सीरीज सिर्फ इंसानों के पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह भी दिखाती है कि इंसानों ने अपने शहरों को कैसे बदला है और शहर बदले में इंसानों को कैसे प्रभावित करते हैं।

सवाल: ‘ब्राउन’ की कहानी आपके पास कैसे आई?

करीब चार साल पहले ज़ी स्टूडियोज़ की तत्कालीन कंटेंट हेड असीमा ने मुझे फोन किया। उन्होंने कहा कि उनके पास एक कहानी है जो  किताब City of Death पर आधारित है और पूछा कि क्या मैं उसे पढ़ना चाहूंगा। मैंने उनसे पूछा कि क्या स्क्रिप्ट तैयार है। उन्होंने कहा कि कहानी और स्क्रीनप्ले का ड्राफ्ट है, लेकिन अंतिम रूप निर्देशक के आने के बाद दिया जाएगा। मैंने किताब पढ़ी और मुझे लगा कि यह सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं है। इसके जरिए कोलकाता, उसकी संस्कृति, उसकी विरासत और उसकी आत्मा को भी महसूस किया जा सकता है। तभी मैंने तय कर लिया कि मुझे यह प्रोजेक्ट करना है।

मेरा हमेशा से मानना रहा है कि चाहे आप कॉमेडी बना रहे हों या थ्रिलर, अगर आप दर्शकों को मनोरंजन के साथ कुछ सोचने के लिए भी दे सकें, तो वह कहानी ज्यादा प्रभावशाली बन जाती है।


सवाल: करिश्मा कपूर को इस किरदार में कास्ट करना कितना चुनौतीपूर्ण था? क्योंकि दर्शकों ने उन्हें इससे पहले कभी इस तरह नहीं देखा।

शायद लोग इसके लिए मुझे दोष दें, लेकिन मेरा हमेशा से मानना रहा है कि अगर किसी किरदार के लिए सबसे पहले जो दो-तीन नाम दिमाग में आते हैं, उन्हीं में से किसी को ले लिया जाए, तो उसमें नया क्या है?

आज दर्शक इतना कंटेंट देख रहे हैं कि अगर आप उन्हें वही देते हैं जिसकी उन्हें उम्मीद है, तो कहीं न कहीं वे निराश हो जाते हैं। इसलिए मुझे ऐसा कलाकार चाहिए था जो इस किरदार के बिल्कुल विपरीत छवि रखता हो। जब आप किसी अभिनेता को उसकी स्थापित छवि से तोड़कर एक नए रूप में पेश करते हैं, तभी दर्शक चौंकते हैं और कहते हैं, अरे, यह कैसे हो गया?

इसका पूरा श्रेय करिश्मा कपूर को जाता है। हमारी लगभग दो घंटे की बातचीत हुई और उसके बाद मुझे किसी और चीज की जरूरत नहीं पड़ी। मैंने उनसे साफ कहा था कि शूटिंग के दौरान मैं उन्हें शीशा नहीं दूंगा। शॉट्स के बीच टच-अप नहीं होगा क्योंकि किरदार में मेकअप लगभग नहीं है। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के इसे स्वीकार किया और वही समर्पण स्क्रीन पर नजर भी आता है।

सवाल: आपकी फिल्मोग्राफी देखें तो गेम, फोर्स 2 अब ब्राउन जैसी कई थ्रिलर और एक्शन कहानियां रही हैं। क्या इस जॉनर से आपका कोई खास लगाव है?

असल में ऐसा बिल्कुल नहीं है। सच कहूं तो मेरा सबसे पसंदीदा जॉनर डार्क कॉमेडी है। ‘दिल्ली बेली’ और ‘ब्लैकमेल’ जैसी फिल्में मेरे दिल के बेहद करीब हैं। लेकिन इंडस्ट्री में अक्सर ऐसा होता है कि एक फिल्म सफल हो जाती है और फिर उसी तरह की दर्जनों स्क्रिप्ट्स आपके पास आने लगती हैं। ‘दिल्ली बेली’ के बाद मेरे पास करीब 42 कॉमेडी फिल्मों की स्क्रिप्ट्स आई थीं, लेकिन मैंने लगभग सभी को मना कर दिया क्योंकि मुझे नहीं चाहिए था कि मेरी अगली कॉमेडी की तुलना सीधे ‘दिल्ली बेली’ से हो।‘फोर्स 2’ आई क्योंकि जॉन अब्राहम मेरे दोस्त हैं। यानी यह कोई सुनियोजित फैसला नहीं था कि मैं सिर्फ क्राइम थ्रिलर ही बनाऊंगा। बस संयोग से ऐसा होता चला गया।


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Content Editor

Mansi

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