अनुभव सिन्हा की ये 5 फ़िल्में बताती हैं भारतीय क़ानून की असली तस्वीर, सिस्टम पर उठाती हैं बड़े सवाल
punjabkesari.in Thursday, Apr 23, 2026 - 02:48 PM (IST)
नई दिल्ली/टीम डिजिटल। फ़िल्मकार Anubhav Sinha ने हिंदी सिनेमा में अपनी विशिष्ट पहचान उन कथाओं के माध्यम से स्थापित की है, जो सत्ता, न्याय और सामाजिक विषमता पर प्रश्न उठाती हैं। हाल के वर्षों में उनकी रचनाएँ भारतीय क़ानून की जटिलताओं से गहराई से संवाद करती दिखाई देती हैं, जहाँ न्यायालयीन संघर्ष, संवैधानिक अधिकार और संस्थागत कमज़ोरियाँ स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती हैं। यहाँ उनकी पाँच महत्त्वपूर्ण फ़िल्में प्रस्तुत हैं, जो भारतीय विधिक संरचना का गंभीर विश्लेषण करती हैं:

1. Assi (ZEE5)
एक प्रभावशाली न्यायालयीन नाटक, Assi रहस्यमयी यौन उत्पीड़न के अनेक मामलों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो जाँच-प्रक्रिया और विधिक व्याख्याओं दोनों को चुनौती देते हैं। जब एक अन्वेषक और प्रतिरक्षा पक्ष की टीम मामले की तह तक पहुँचने का प्रयास करती है, तब कथा आँकड़ों से आगे बढ़कर व्यवस्था में निहित असुविधाजनक सत्य को उजागर करती है। Taapsee Pannu अभिनीत यह फ़िल्म इस बात पर प्रकाश डालती है कि विधि संवेदनशील अपराधों से किस प्रकार जूझती है साक्ष्य, पक्षपात और प्रमाण के भार जैसे प्रश्नों को केंद्र में रखते हुए। साथ ही, यह उन मानवीय पीड़ाओं को भी सामने लाती है, जो प्रायः समाचारों की सुर्खियों में ओझल हो जाती हैं।

2. Article 15 (Netflix)
वास्तविक घटनाओं से प्रेरित Article 15 एक पुलिस अधिकारी की कथा है, जो दलित बालिकाओं के लापता होने की जाँच करते हुए गहरे पैठे सामाजिक भेदभाव का सामना करता है। फ़िल्म का शीर्षक भारतीय संविधान के Article 15 of the Indian Constitution से लिया गया है, जो धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है। यह फ़िल्म दर्शाती है कि संवैधानिक आदर्श और सामाजिक यथार्थ के बीच कितना गहरा अंतर विद्यमान है।
3. Thappad (Prime Video)
Thappad एक साधारण प्रतीत होने वाली घरेलू हिंसा की घटना एक थप्पड़ से आरम्भ होकर व्यापक विधिक और नैतिक विमर्श का रूप ले लेती है। यह फ़िल्म एक स्त्री के तलाक़ लेने के निर्णय के माध्यम से यह प्रश्न उठाती है कि समाज किस प्रकार हिंसा को सामान्य बना देता है। न्यायालयीन प्रक्रियाओं और भावनात्मक घटनाक्रमों के माध्यम से, यह व्यक्तिगत गरिमा और वैवाहिक समानता की रक्षा में विधि की भूमिका को रेखांकित करती है।

4. Mulk (ZEE5)
एक सशक्त न्यायालयीन नाटक, Mulk पहचान, पूर्वाग्रह और न्याय के प्रश्नों को केंद्र में रखती है। कथा एक मुस्लिम परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जिस पर एक आतंकवादी को शरण देने का आरोप लगाया जाता है। यह फ़िल्म न्यायपालिका की उस भूमिका को प्रस्तुत करती है, जहाँ सत्य की पुनर्स्थापना का प्रयास किया जाता है, साथ ही यह भी दर्शाती है कि सामाजिक पूर्वाग्रह विधिक प्रक्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।

5. Bheed (Netflix)
यद्यपि Bheed पारंपरिक अर्थों में न्यायालयीन नाटक नहीं है, तथापि यह भारतीय विधि और शासन की वास्तविकताओं से गहराई से जुड़ी हुई है। कोविड-19 लॉकडाउन की पृष्ठभूमि में स्थापित यह फ़िल्म दर्शाती है कि आपातकालीन परिस्थितियों में जारी विधिक आदेशों का ज़मीनी स्तर पर क्या प्रभाव पड़ता है। इसका मूल संवैधानिक अधिकारों विशेषतः आवागमन की स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा तथा राज्य की शक्ति के मध्य अंतर्विरोध को उजागर करना है। यह फ़िल्म विधि के क्रियान्वयन में विद्यमान असमानताओं और विसंगतियों को सामने लाती है।
