आईए करें, मुलाकात भटकती आत्माओं के साथ
punjabkesari.in Wednesday, Dec 18, 2019 - 07:39 AM (IST)
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दक्षार्ण देश के पश्चिम भाग में एक बहुत बड़ा रेगिस्तान था। कोई पेड़-पौधे न होने से भूमि हमेशा तपती रहती थी। कंटीली झाड़ियों के फल तो शायद कभी मिल भी जाएं, पर पानी की बूंद कहीं नहीं मिलती थी। तपती रेत से पानी का भ्रम होने पर मृग प्यास से तड़पते हुए दौड़-दौड़ कर मर जाते थे। एक बार एक व्यापारी अपने साथियों से भटक कर उस भयंकर मरुभूमि में पहुंच गया। भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह इस निर्जन प्रदेश में असहाय होकर भटक रहा था और सोच रहा था कि न जाने किस पाप से यहां आ गया, अब तो लगता है भूख-प्यास से यहीं मर जाना होगा।

इस क्षेत्र में कुछ प्रेत आत्माएं रहती थीं। इस जीवित प्राणी को इस प्रकार व्याकुल और भूख-प्यास से तड़पते देख कर एक प्रेत को उस पर दया आ गई और उसने पूछा, ‘‘तुम इस निर्जन मरुभूमि में कैसे आ गए?’’
व्यापारी ने इधर-उधर देखा कि यह मनुष्यों जैसी आवाज कहां से आ रही है? जब कोई दिखाई न दिया तो वह बोला, ‘‘आप कौन हैं और कहां से बोल रहे हैं? मुझे दिखाई नहीं दे रहे हैं। मैं अपने किसी पूर्व बुरे कर्म के कारण अपने साथियों से भटक कर यहां आ गया। अब लगता है मेरे जीवन का अंत ही यहां होगा। भूख-प्यास से मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। कोई उपाय नहीं दिख रहा है।’’

प्रेत बोला, ‘‘घबराओ मत, मैंने अपने पूर्वजन्म में मनुष्य का जीवन केवल अपने स्वार्थ के लिए जिया। कभी किसी का उपकार नहीं किया। न भूखे को अन्न दिया, न प्यासे को पानी। न ही कोई पुण्य कार्य किया। मृत्यु के बाद अपने कर्म-फल से मुझे प्रेत-योनि मिली है। मेरा सूक्ष्म शरीर उसी कर्म-फल को भोग रहा है। तुम चिंता मत करो। यहीं प्रतीक्षा करो। थोड़ी देर बार एक पुण्यात्मा प्रेत आकर तुम्हें अन्न-जल देगा। फिर तुम अपने मनचाहे स्थान पर चले जाना।’’
वह प्रेतों के बीच में है, यह सोचकर व्यापारी को बड़ा डर लगा, पर थोड़ा आश्वासन पाकर उसे अपने जीवन की आशा मिली। प्रेत की बात सुनकर वह शांत भाव से बैठ गया। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि एक कटोरे में जल और थाली में भोजन उसके सामने रखा है। प्रेत बोला, ‘‘भोजन करो, जल पियो और संतुष्ट हो जाओ। अब हम लोग भी खाना खा रहे हैं।’’

भूखे-प्यासे व्यापारी ने भोजन कर लिया, पर सोचने लगा कि अदृश्य रूप से यह भोजन देने और इतने प्रेतों को भोजन खिलाने वाला कौन है? उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। संतुष्ट होकर उसने कहा, ‘‘इस निर्जन मरुभूमि में अदृश्य रूप से मेरे जीवन दाता! आप कौन हैं? इस दुर्गम स्थान में यह अन्न-जल आपको कहां से मिला और एक-एक ग्रास लेकर आप सब कैसे संतुष्ट हो गए? आप सब कोई महान प्रेतात्मा लगते हैं।’’
यह सुनकर प्रेतराज ने कहा, ‘‘हे मानव! मैं अपने मनुष्य जीवन में बड़ा ही दुष्ट प्रकृति का था। प्रमादवश मैंने कभी न किसी भूखे को भोजन दिया न प्यासे को पानी। धन के लोभ में अपने ही स्वार्थ में जीता रहा। कभी कोई पुण्य कार्य करने को सोचा ही नहीं। संयोग से अपने पड़ोस में रहने वाले एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण के साथ मैं तीर्थ यात्रा पर गया और उसके साथ उसे देखकर मैंने भी तीर्थ क्षेत्रों में दान-पुण्य किया। अन्न क्षेत्र खोला। वस्त्र दान किया। धर्म-क्षेत्र में जो भी पुण्य कार्य संभव हुआ वह किया। शायद उसी थोड़े से पुण्य-कर्म से मुझे यहां की प्रेतात्माओं की भूख मिटाने का पुण्य मिल रहा है। यहां रहने वाले अन्य प्रेत भी अपने पूर्व जन्म के दुष्कर्मों के कारण प्रेतयोनि का कष्ट भोग रहे हैं।’’

व्यापारी ने कहा, ‘‘हे प्रेतराज! आप इस योनि में भी मेरे लिए गुरु-तुल्य हैं। मैं अब जाकर अपना शेष जीवन दान-पुण्य करने तथा परोपकार में बिताऊंगा। आप सबकी मुक्ति के लिए मैं क्या कर सकता हूं?’’ मुझे यह बता दीजिए।
प्रेतराज बोला, ‘‘अच्छे कर्मों का मन में संकल्प करने से ही पुण्य का फल मिलने लगता है। आप अपने घर जाकर अपने इन उत्तम विचारों से कार्य कीजिए तथा गया-तीर्थ में जाकर अक्षयवट के नीचे हम प्रेतों के नाम पर श्राद्ध-तर्पण कीजिए। आपके पुण्य-फल से हम सब प्रेतयोनि से मुक्त हो जाएंगे।’’
व्यापारी ने सोचा, ‘‘जिस आत्मा ने प्रेत-योनि में भी मेरे जीवन की रक्षा कर एक प्रकार से मुझे पुनर्जीवन दिया है, मैं उसकी तथा उसके समस्त प्रेतात्माओं की मुक्ति के लिए पुण्य कार्य कर अपना पुण्य उन्हें श्राद्ध में अर्पित कर उनकी मुक्ति का प्रयास करूंगा। प्रेत द्वारा निर्देशित मार्ग से वह मरुभूमि पार कर अपने देश आ गया और जैसा सोचा था वैसा किया।’’
(भविष्य पुराण से)‘राजा पाकेट बुक्स’ द्वारा प्रकाशित पुराणों की कथाएं से साभार
