Buddha Purnima: बुद्ध पूर्णिमा पर जानें, सिद्धार्थ से बुद्ध तक की यात्रा और बोधगया में शाश्वत सत्य की खोज

punjabkesari.in Friday, May 01, 2026 - 08:35 AM (IST)

Buddha Purnima 2026: संपूर्ण विश्व के बौद्ध धर्म के उपासकों के लिए वैशाख मास की पूर्णिमा का विशेष रूप से महत्व है। इसी दिन 563 ईसवी पूर्व  इक्ष्वाकु क्षत्रिय वंशीय राजा शुद्धोधन के घर में लुंबिनी नामक स्थान पर महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। बुद्ध पूर्णिमा का संबंध गौतम बुद्ध के साथ केवल जन्म भर का नहीं है बल्कि इसी पूर्णिमा तिथि को कठोर तपस्या करने के पश्चात बोधगया में बुद्ध को शाश्वत सत्य का ज्ञान हुआ था।

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सनातनी साहित्य में भी भगवान गौतम बुद्ध को विष्णु का नवम अवतार माना गया है। वैशाख मास की पूर्णिमा के दिन ही गौतम को बुद्धत्व एवं आत्मिक जागृति की प्राप्ति हुई थी इसीलिए यह बुद्ध पूर्णिमा के नाम से विख्यात है। समृद्ध राजशाही परिवार में जन्म लेने के उपरांत भी ये सांसारिक भोग विषयों में लिप्त नहीं हुए। आंतरिक शाश्वत सत्य को जानने की पिपासा तथा वैराग्य के प्रबल संस्कारों ने इन्हें आध्यात्मिक मार्ग तथा साधना मार्ग का पथिक बना दिया।

भौतिक रूप से समृद्ध राजशाही ठाठ को त्याग कर यह कठोर साधना के जीवन की ओर बढ़ गए। जरा, मृत्यु, जन्म, सांसारिक दुख इन सभी प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए गौतम बुद्ध शाश्वत आनंद की यात्रा के पथिक बन गए। निरंतर साधना, संयम और तपस्या के फल स्वरूप बोधगया नामक स्थान पर बोधि वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ के अंत:करण में आत्मिक जागृति का उदय हुआ और वहीं से उनको बुद्धत्व की प्राप्ति हुई।

बौद्ध धर्म के संस्थापक एवं सूत्रधार बनकर इस महामानव ने लाखों अनुयायियों को बौद्ध धर्म में दीक्षित करके साधना और आत्मज्ञान के मार्ग पर चलाया। इन्होंने अपने संपूर्ण उपदेश पाली भाषा में दिए तथा मगध को प्रचार का मुख्य केंद्र बनाया। कौशल देश की राजधानी श्रावस्ती में महात्मा बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश दिए।

इनके संयम, त्याग, करुणा और विशाल व्यक्तित्व से प्रभावित होकर तत्कालीन सम्राट बिंदुसार भी इनके शिष्य बन गए। इन्होंने अपने शिष्यों को अष्टांगिक नियमों के आचरण पर बल दिया। सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक, सम्यक कर्मांत, सम्यक अवलोकन, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक जागृति, सम्यक समाधि।

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महात्मा बुद्ध के इन स्वर्णिम 8 सिद्धांतों में मनुष्य की व्यक्तिगत, सामाजिक, शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक उन्नति का मार्ग समावेशित है। अज्ञानता को महात्मा बुद्ध ने दुखों का मूल कारण माना है। क्रोध, काम, मोह, ईर्ष्या, द्वेष को महात्मा बुद्ध ने मानसिक एकाग्रता में बाधक माना है इसलिए अपने शिष्यों को शारीरिक, मानसिक रूप से एकाग्र बनाने के लिए वह स्वयं को स्थिर करने का उपदेश दिया करते थे।

इनका चिंतन था कि सांसारिक भोग विषयों में अत्यधिक आसक्ति आंतरिक शांति और आनंद में बाधक है। ज्ञान एवं ध्यान के मार्ग पर चलकर ही सम्यक शांति को प्राप्त किया जा सकता है। महात्मा बुद्ध का जीवन अहिंसा, करुणा, प्रेम, स्नेह, सहानुभूति, सत्य और पवित्र आचरण का प्रतिबिम्ब था। आचरण की शुचिता को उन्होंने साधना का आधार स्तंभ माना है। अपने शिष्यों को प्रेरणादायी उपदेश देते हुए कहा करते थे कि अपने जीवन का दीपक खुद बनो।

आंतरिक रूप से जागृत और प्रबुद्ध मनुष्य ही स्वयं के अस्तित्व को विवेकपूर्वक जानकर आत्मज्ञानी बनने में समर्थ होता है। महात्मा बुद्ध ने क्रोध को अक्रोध से, हिंसा को अहिंसा से, ईर्ष्या-द्वेष को प्रेम और स्नेह के माध्यम से विजय पाने का संदेश दिया।
बुद्ध के इन्हीं करुणामयी उपदेशों से कलिंग के युद्ध में नरसंहार और हिंसा से मानसिक रूप से विचलित सम्राट अशोक को शांति और सत्य का मार्ग प्राप्त हुआ था।

भगवान श्रीराम के समान महात्मा बुद्ध ने मर्यादा और श्रेष्ठ आदर्शों की स्थापना की तो श्री कृष्ण के समान उन्होंने योग, राजयोग, कर्मयोग के सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

महात्मा बुद्ध एकमात्र ऐसे विलक्षण महापुरुष थे जिनका जन्म, ज्ञान प्राप्ति तथा महानिर्वाण एक ही दिन वैशाख पूर्णिमा को हुआ। गौतम बुद्ध के स्वर्णिम संदेश प्रत्येक मनुष्य को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाने वाले हैं। आध्यात्मिक साधना के उपासकों के लिए बुद्ध का जीवन प्रेरणा पुंज के समान है।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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