‘धर्म एवं पर्यावरण’ का क्या है संबंध?

11/25/2021 5:31:55 PM

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
पर्यावरण शब्द दो शब्दों ‘परि’ व ‘आवरण’ से मिल कर बना है जिसका अर्थ ‘परि’-चारों ओर ‘आवरण’ ‘घेरा’ अर्थात ‘हमें चारों ओर से घेरने वाला’ ही पर्यावरण है। विश्व के आधुनिकीकरण के साथ ही पर्यावरण को हो रहा नुक्सान एक नई समस्या के रूप में उभर कर सामने आया है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहां विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं। भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता इस तथ्य का प्रमाण है कि भारत में सर्वधर्म समभाव को सदैव आदर की दृष्टि से देखा गया है। समस्त धर्मों का मानव जाति के लिए एकमात्र शाश्वत सत्य एवं संदेश है ‘जीओ और जीने दो’। यह संबंध न केवल मानव समुदाय से, बल्कि प्रत्येक चर, अचर, जीव, जड़ प्रकृति एवं पर्यावरण से भी संबंधित है।

धर्म एवं पर्यावरण का गहरा संबंध है। विश्व के सभी धर्मों में निरर्थक जीव ङ्क्षहसा को निषेध माना गया है। हिन्दू, ईसाई, मुस्लिम, जैन एवं बौद्ध धर्म सभी में धर्मावलंबियों ने प्रकृति को पुष्पित, पल्लवित एवं प्रफुल्लित रूप में देखने का प्रयास किया है।

हिन्दू धर्म :
हिन्दू धर्म में प्रकृति को देवी के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है। वेदांत दर्शन में कहा गया है कि आप: शांति, वायु शांति, अग्नि शांति, पृथ्वी शांति: सर्वांग शांति अर्थात प्रकृति के सभी उपादानों की उपासना सर्वत्र शांति के लिए की गई है। इस प्रकार कहा गया है कि यदि प्रकृति का अत्यधिक दोहन या शोषण होता है तो पर्यावरण दूषित होता है तथा पर्यावरण के प्रदूषित होने से मनुष्य मात्र का भी जीवन संकट में पड़ सकता है। हमारे पौराणिक शास्त्रों यथा वेद, उपनिषद, पुराण आदि में अग्नि, जल, वायु, भूमि आदि की पूजा एवं उपयोगिता का प्रावधान रखा गया है। इसके अतिरिक्त पीपल, तुलसी आदि के पेड़-पौधों को देवतुल्य समझ कर उनकी आराधना एवं पूजा का विधान रखा गया। अग्नि, जल वायु पृथ्वी को अध्र्य देने से तथा यज्ञों के माध्यम से आहूति देने पर इंद्रदेव प्रसन्न होकर वर्षा करते हैं, ऐसी मान्यता हिन्दू धर्म की मानी गई है, जो किसी न किसी रूप में वातावरण को शुद्ध करने से जुड़ी हुई थी।

इस्लाम :
इस्लाम में भी प्रकृति को संजोने, संवारने के कृत्य को प्रत्येक मुस्लिम का कत्र्तव्य माना गया है। इस्लाम में भी जीव हत्या को निषेध तथा पेड़-पौधों की रक्षा करने की हिदायत दी गई है। कुरान में अनेक स्थानों पर ऐसे संकेत मिलते हैं कि ईश्वर/अल्लाह एवं जीवों के बीच प्रेम का अटूट संबंध है। कुरान यह भी मानता है कि खुदा, आकाश पर रहता है तथा वहां होने वाले किसी भी नुक्सान से उसे चोट पहुंचती है तथा इससे होने वाले हानिकारक प्रभावों से खुदा के बंदों को भी पर्यावरणीय प्रदूषण भोगना पड़ता है। इस्लाम धर्म के अनुयायी भारतीय बादशाहों ने भी अपने घरों में तुलसी को आदरभाव से रखा। हजरत मोहम्मद साहब स्वयं खजूर के पेड़ के निकट बैठकर अपने अनुयायियों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। अकबर बादशाह तो होम, यज्ञ, वेद, सूर्य प्रणाम एवं तुलसी तथा पीपल पूजा में विश्वास करता था। इसी प्रकार शाहजहां ने मोर का शिकार करने वाले अफसरों के हाथ कटवा दिए थे।

ईसाई धर्म :
 ईसाई धर्म भी सदा अङ्क्षहसा का पक्षधर रहा है। ईसा मसीह स्वयं जीवों पर दया, अङ्क्षहसा, करुणा एवं मैत्री में विश्वास करते थे। ईसा मसीह भौतिकवादी व्यवस्था के विपरीत थे। उनके अनुसार मानव के स्वार्थ एवं दूषित विचारों एवं आविष्कारों से वातावरण प्रदूषित हो जाता है। मानव मात्र से प्रेम करना, जीवों पर दया करना, प्रकृति को पूजनीय मानना एवं ङ्क्षहसा से दूर रहना ही ईसाई धर्म के प्रमुख सिद्धांत हैं।

जैन धर्म :
जैन धर्म में प्रत्येक व्यक्ति को पंचव्रतों को पूर्ण करना पड़ता है, ये हैं-सत्य, अङ्क्षहसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह। जैन धर्म का प्रत्येक अनुयायी वनों के प्रति संवेदनशील होता है। जैन धर्म के प्राय: सभी धर्म गुरुओं ने वनों में तपस्या की थी तथा पेड़-पौधों एवं प्रकृति को संरक्षित रखने तथा पर्यावरण के शुद्धिकरण में विश्वास व्यक्त किया था।

बौद्ध धर्म :
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक भगवान बुद्ध को बड़ वृक्ष के नीचे ही ज्ञान  प्राप्त हुआ था। 

बिश्नोई समाज :
राजस्थान में बिश्नोई समाज में प्रकृति प्रेम का अनूठा उदाहरण मिलता है। खेजड़ी वृक्ष की रक्षा के लिए खेजडली गांव में 363 बिश्नोईयों द्वारा अपने प्राणों का त्याग करने की घटना अन्यत्र नहीं मिलती है। बिश्नोई समाज भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं का जीवंत संवाहक है जिसमें पेड़ न काटने, जानवरों की एवं पक्षियों की रक्षा करने तथा प्राणी मात्र की रक्षा करने का संकल्प लिया जाता है। बिश्नोई धर्म के धर्मगुरु जम्भेश्वरजी ने अपने 21 नियमों (20+1) में प्रकृति को संरक्षित करने का अनूठा प्रयास किया। उपनिषदों में पृथ्वी को परमात्मा का शरीर, स्वर्ग को मस्तिष्क, सूर्य एवं चंद्रमा को आंखें तथा आकाश को मन माना है। पेड़-पौधे काटने तथा जल स्रोतों को प्रदूषित करने से परमात्मा को चोट पहुंचती है।

इस प्रकार सभी धर्मों (हिन्दू, मुस्लिम, वैदिक, जैन, बौद्ध) के प्रवर्तकों ने वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को स्वीकारा  एवं  ‘सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया’ की कल्पना को संजोया तथा प्रकृति के दोहन का विरोध किया।  —डा. नवीन कुमार बोहरा

 


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Content Writer

Jyoti

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