Vinoba Bhave Jayanti 11th September 2026: 'गीताई' के रचयिता से लेकर 'भारत रत्न' तक, पढ़ें विनोबा भावे के जीवन की संपूर्ण प्रेरक कहानी
punjabkesari.in Thursday, Sep 10, 2026 - 10:48 AM (IST)
Vinoba Bhave Jayanti 11th September 2026: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और आजाद भारत के सामाजिक पुनरुत्थान में कुछ विभूतियां ऐसी हुई हैं, जिन्होंने बिना सत्ता और राजनीति के ही पूरे समाज की दिशा बदल दी। ऐसे ही महान संत, विचारक और महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी थे आचार्य विनोबा भावे। 11 सितंबर को उनकी पावन जयंती पर पंजाब केसरी विशेष आलेख के माध्यम से जानिए कि कैसे एक युवा ने हिमालय जाने का विचार त्यागकर देश के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और भूदान का अलख जगाने का संकल्प लिया।

आचार्य विनोबा भावे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक सुधार के इतिहास के ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिन्होंने सत्ता और राजनीति से दूर रहकर सत्य, अहिंसा, त्याग और सामाजिक समानता को अपने जीवन का आधार बनाया। वे महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माने जाते हैं। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका के साथ-साथ उन्होंने आजादी के बाद भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और सम्मान पहुंचाने का प्रयास किया। भूदान आंदोलन उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। 11 सितम्बर, 1895 को बॉम्बे प्रैसीडैंसी के गागोडे गांव में जन्मे विनोबा भावे का मूल नाम विनायक नरहरि भावे था। पिता नरहरि शंभू भावे गणित और विज्ञान में रुचि रखते थे, जबकि मां रुक्मिणीबाई धार्मिक महिला थीं।

बचपन से ही विनोबा पर मां के संस्कारों का गहरा प्रभाव पड़ा। मां संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम और नामदेव की कथाएं सुनातीं तथा रामायण, महाभारत, उपनिषद और भगवद्गीता के विचारों से उन्हें परिचित करातीं।
किशोरावस्था से ही विनोबा का झुकाव आध्यात्मिकता, अध्ययन और त्याग की ओर था। उन्होंने संस्कृत और भारतीय दर्शन का गहन अध्ययन किया। 1916 में इंटर की परीक्षा देने मुंबई जाते समय सूरत स्टेशन पर उतर गए। उनके मन में हिमालय जाकर संन्यास लेने की प्रबल इच्छा थी, लेकिन जीवन ने उनके लिए अलग मार्ग चुना।

7 जून, 1916 को अहमदाबाद के कोचरब आश्रम में उनकी महात्मा गांधी से पहली मुलाकात हुई। उनके विचारों और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर वे उनके निकट सहयोगी बन गए। उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। विनोबा गंभीर चिंतक और लेखक भी थे। उन्होंने भगवद्गीता का सरल मराठी रूपांतरण ‘गीताई’ के नाम से किया। इसके अलावा उपनिषदों और संत साहित्य पर भी व्यापक लेखन किया।
आजादी के बाद उन्होंने सामाजिक और आर्थिक असमानता दूर करने के लिए भूदान आंदोलन हेतु देशभर में पदयात्राएं कर भू-स्वामियों से अपनी जमीन का एक हिस्सा भूमिहीनों को दान करने की अपील की। सामाजिक योगदान के लिए उन्हें 1958 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने 1983 में उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया। 15 नवम्बर, 1982 को महाराष्ट्र के पवनार आश्रम में उनका निधन हुआ।

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