Aja Ekadashi Vrat Katha : दूर होंगे पाप और मिलेगा पुण्य बस अजा एकदाशी के दिन जरूर पढ़े ये कथा
punjabkesari.in Sunday, Sep 06, 2026 - 12:14 PM (IST)
Aja Ekadashi Vrat Katha : सनातन धर्म में अजा एकदाशी का बहुत खास महत्व है। हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष कू एकादशी तिथि को अजा एकादशी का व्रत रखा जाता है। यह पावन दिन भगवान श्री हरि विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, अजा एकादशी का व्रत रखने और इसकी कथा सुनने मात्र से मनुष्य को समस्त पापों, कष्टों और पूर्व जन्म के बुरे कर्मों से मुक्ति मिल जाती है। तो आइए जानते हैं अजा एकादशी की व्रत कथा के बारे में-
पौराणिक कथा में एक अत्यंत वीर प्रतापी और सत्यवादी हरिश्चन्द्र नाम चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। प्रभु इच्छा से उसने अपना राज्य स्वप्न में एक ऋषि को दान कर दिया और परिस्थिति वश उन्हें अपनी स्त्री और पुत्र को भी बेच देना पड़ा। स्वयं को एक चाण्डाल के यहां कफन लेने का काम किया, किंतु उन्होंने इस मुश्किल काम में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। जब इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए तो उन्हें अपने इस नीच कर्म पर बड़ा दुख हुआ और वो इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगे। वो सदैव इसी चिंता में रहने लगे कि मैं क्या करुं? किस प्रकार इस नीच कर्म से मुक्ति पाऊं। एक बार की बात है, वो इसी चिंता में बैठे थे कि गौतम ऋषि उनके पास पहुंचे। हरिश्चंद्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुख भरी कथा सुनाई। राजा हरिश्चन्द्र की दुख-भरी कहानी सुनकर महर्षि गौतम भी अत्यन्त दुखी हुए और उन्होंने राजा से कहा - ' हे राजन ! भादों के कृष्ण पक्ष की एकादशी नाम अजा है। तुम उस एकादशी का विधानपूर्वक व्रत करो और रात्रि के जागरण करो। इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे। महर्षि गौतम इतना कह कर चले गए।
अजा नाम की एकादशी आने पर राजा हरिश्चनद्र ने महर्षि के कहे अनुसार विधानपूर्वक उपवास और रात्रि जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा के सभी पाप नष्ट हो गए। उस समय स्वर्ग में नगाड़े बजने लगे और पुष्पों की वर्षा होने लगी। उन्होंने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु , महेश और देवेन्द्र आदि देवताओं को खड़ा पाया और ये ही नहीं वहीं उन्होंने अपने मृतक पुत्र और अपनी पत्नी को राजसी वस्त्र और आभूषणों से परिपूर्ण देखा। व्रत के प्रभाव से राजा को पुन: अपने राज्य की प्राप्ति हुई। वास्तव में एक ऋषि ने राजा की परीक्षा लेने के लिए ये सब कौतुक किया था, परंतु अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ऋषि द्वारा रची गई सारी माया समाप्त हो गई और अन्त समय में हरिश्चंद्र अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक को चले गए।
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