Veer Savarkar Death Anniversary : इतिहास के सबसे विवादित क्रांतिकारी, पढ़ें वीर सावरकर की अनोखी कहानी
punjabkesari.in Thursday, Feb 26, 2026 - 01:21 PM (IST)
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Veer Savarkar Death Anniversary : भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में Vinayak Damodar Savarkar एक ऐसे व्यक्तित्व रहे, जिनके योगदान के साथ-साथ विवाद भी जुड़े रहे। समय-समय पर उनके विचारों, लेखन और राजनीतिक रुख को लेकर बहस होती रही है। फिर भी यह निर्विवाद है कि आजादी की लड़ाई में उनकी एक सक्रिय भूमिका थी। उनकी पुण्यतिथि पर उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण और कम चर्चित पहलुओं को समझना प्रासंगिक है।
सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भागुर गांव में हुआ। किशोरावस्था से ही उनमें राष्ट्रवादी विचार प्रबल थे। छात्र जीवन में वे विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार जैसे आंदोलनों से जुड़े। उच्च शिक्षा के दौरान वे क्रांतिकारी गतिविधियों के संपर्क में आए और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित विरोध के पक्षधर बने।

1909 में उन्हें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने समुद्र में छलांग लगाकर भागने की कोशिश भी की, लेकिन दोबारा पकड़ लिए गए। 1911 में उन्हें दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा गया, जिसे ‘कालापानी’ कहा जाता था। जेल के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार को दया याचिकाएं भेजीं। आलोचक इसे समर्पण मानते हैं, जबकि समर्थकों का तर्क है कि यह कदम राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था। 1924 में कुछ शर्तों के साथ उनकी रिहाई हुई, जिनमें एक शर्त यह भी थी कि वे कुछ वर्षों तक सक्रिय राजनीति से दूर रहेंगे।
रिहाई के बाद सावरकर ने रत्नागिरी में सामाजिक सुधार के कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने छुआछूत के खिलाफ अभियान चलाया और विभिन्न जातियों के लोगों के साथ सामूहिक भोजन जैसी पहलें शुरू कीं। वे सामाजिक एकता और संगठन के पक्षधर थे।

सावरकर एक सक्रिय लेखक भी थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में कई पुस्तकें लिखीं। उनकी चर्चित कृतियों में 1857 के विद्रोह पर आधारित पुस्तक और ‘हिंदुत्व’ विषयक लेखन शामिल है। उनके कई लेखन पर ब्रिटिश शासन ने प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया, लेकिन वे विभिन्न माध्यमों से प्रकाशित होते रहे। उन्होंने हिंदू समाज में प्रचलित कुछ परंपरागत बंदिशों को तोड़ने का आह्वान किया, जिनमें छुआछूत, पेशेगत बंधन और अंतरजातीय संबंधों पर रोक जैसी सामाजिक बाधाएं शामिल थीं।
उनका नाम महात्मा गांधी की हत्या की साजिश के संदर्भ में भी सामने आया, लेकिन अदालत में आरोप सिद्ध नहीं हो सके। स्वतंत्रता सेनानी Bhagat Singh ने भी एक लेख में सावरकर के व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए उन्हें ‘वीर’ कहा था। बाद के वर्षों में Indira Gandhi ने भी उन्हें एक उल्लेखनीय देशभक्त के रूप में याद किया और उनके सम्मान में डाक टिकट जारी हुआ।
जीवन के अंतिम चरण में सावरकर ने यह कहते हुए अन्न-जल त्याग दिया कि उनका जीवन उद्देश्य पूर्ण हो चुका है। 26 फरवरी 1966 को उनका निधन हुआ। उनका जीवन आज भी बहस, अध्ययन और पुनर्मूल्यांकन का विषय बना हुआ है—एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसे अलग-अलग नजरियों से देखा और समझा जाता है।

