संकल्प, साहस और राष्ट्रभक्ति की जीवंत मिसाल हैं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जानिए उनके संघर्ष और बलिदान की अमर गाथा

punjabkesari.in Monday, Jun 22, 2026 - 02:28 PM (IST)

Syama Prasad Mookerjee Story : ‘एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे’ का नारा देने वाले जनसंघ के संस्थापक, महान शिक्षाविद् और प्रखर राष्ट्रवादी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय राजनीति के ऐसे अमर नायक हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाने के उनके संकल्प ने देश की राजनीति पर गहरा प्रभाव छोड़ा। 

5 अगस्त, 2019 को केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को समाप्त किए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान पूरी तरह लागू हुआ, जिसे उनके संकल्प की पूर्ति के रूप में देखा जाता है। 6 जुलाई, 1901 को कोलकाता के एक प्रतिष्ठित परिवार में उनका जन्म हुआ। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी प्रसिद्ध शिक्षाविद्, न्यायविद् तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति थे। माता का नाम जोगमाया देवी था।

डॉ. मुखर्जी ने प्रारंभिक शिक्षा के बाद 1923 में विधि की पढ़ाई पूरी की और आगे की शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए। 1926 में बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। अपनी प्रतिभा और विद्वता के बल पर वह मात्र 33 वर्ष की आयु में 8 अगस्त, 1934 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के कुलपति बने। 16 अप्रैल, 1922 को उनका विवाह सुधा देवी से हुआ। उनके चार बच्चे हुए, लेकिन 1934 में उनकी पत्नी का असामयिक निधन हो गया। इसके बाद उन्होंने अपने बच्चों का पालन-पोषण परिवार के सहयोग से किया और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे।

भारत विभाजन के समय उन्होंने प्रस्तावित पाकिस्तान से बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग उठाई, जिसके परिणामस्वरूप इन दोनों प्रांतों के महत्वपूर्ण हिस्से भारत में बने रहे। स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्रिमंडल में वह उद्योग मंत्री बने, लेकिन वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरु गोलवलकर के परामर्श से 21 अक्तूबर, 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की और उसके प्रथम अध्यक्ष बने।

उस समय जम्मू-कश्मीर में अलग संविधान, अलग झंडा और अलग प्रशासनिक व्यवस्था थी। वहां प्रवेश के लिए भारतीय नागरिकों को परमिट लेना पड़ता था। डॉ. मुखर्जी इसका विरोध करते थे। अगस्त 1952 में जम्मू की एक विशाल रैली में उन्होंने घोषणा की थी ‘या तो मैं आपको भारतीय संविधान दिलाऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’

अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वह 8 मई, 1953 को बिना परमिट जम्मू-कश्मीर के लिए रवाना हुए। 11 मई को उन्हें गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया गया। 23 जून, 1953 को श्रीनगर में नजरबंदी के दौरान रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु को लेकर लंबे समय तक प्रश्न उठते रहे और कई नेताओं ने इसकी निष्पक्ष जांच की मांग की थी।

उनकी स्मृति में देशभर में अनेक संस्थानों और स्थानों का नामकरण किया गया है। दिल्ली में श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज तथा कई नगर और योजनाएं उनके नाम पर हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन राष्ट्रहित, त्याग और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। उनकी पुण्यतिथि पर हमें राष्ट्रीय एकता, अखंडता और राष्ट्रसेवा के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेना चाहिए। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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Content Editor

Sarita Thapa

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