Maharishi Ved Vyas Jayanti: वेदों के विस्तारक और भगवान विष्णु के अवतार, जानें महर्षि वेदव्यास के जीवन से जुड़े अनसुने रहस्य
punjabkesari.in Tuesday, Jul 28, 2026 - 02:41 PM (IST)
Maharishi Ved Vyas Jayanti: भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा के स्तंभ महर्षि वेदव्यास जी की जयंती देश भर में श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को जन्मे महर्षि व्यास को न केवल महाभारत का रचयिता माना जाता है, बल्कि उन्हें ज्ञान का वह अथाह सागर कहा जाता है जिसने वेदों को मानव जाति के लिए सुलभ बनाया। इसी पावन दिन को हम 'गुरु पूर्णिमा' के रूप में भी मनाते हैं।
भगवान विष्णु के साक्षात स्वरूप हैं व्यास जी
शास्त्रों में महर्षि वेदव्यास जी को भगवान श्री हरि विष्णु का ही एक अवतार माना गया है। उनकी स्तुति में कहा गया है कि 'व्यास ही विष्णु हैं और विष्णु ही व्यास हैं'। ऋषि पराशर के पुत्र के रूप में जन्मे व्यास जी का एक नाम 'कृष्ण द्वैपायन' भी है, क्योंकि उनका जन्म एक द्वीप पर हुआ था और उनका रंग श्याम (सांवला) था।
वेदों का विभाजन और 'वेदव्यास' नाम का रहस्य प्रारंभ में 'वेद' एक ही था, लेकिन जनसाधारण के लिए इसे समझना कठिन था। महर्षि व्यास ने अपनी दिव्य दृष्टि से वेदों का विभाजन किया और उन्हें चार भागों में व्यवस्थित किया। इसी कारण उनका नाम 'वेदव्यास' पड़ा। उन्होंने न केवल वेदों को बांटा, बल्कि 18 पुराणों, ब्रह्मसूत्र और मीमांसा जैसे अद्वितीय ग्रंथों की रचना कर सनातन धर्म को एक नई दिशा दी।

महाभारत रचना की अनोखी शर्त, गणेश जी बने लेखक
जब महर्षि व्यास के मन में समस्त वेदों के सार रूप में 'महाभारत' रचने का विचार आया, तब ब्रह्मा जी के आदेश पर उन्होंने भगवान श्री गणेश का आह्वान किया। गणेश जी लिखने को तैयार तो हुए, लेकिन एक शर्त रखी कि 'मेरी कलम एक क्षण के लिए भी रुकनी नहीं चाहिए'। तब व्यास जी ने भी चतुराई से कहा कि आप श्लोक का अर्थ समझकर ही उसे लिखेंगे। जब गणेश जी कठिन श्लोकों का अर्थ समझते, उतने समय में व्यास जी नए श्लोकों की रचना कर लेते थे।
मानव लोक के लिए एक लाख श्लोकों का उपहार वेदव्यास जी ने धर्म की रक्षा हेतु साठ लाख श्लोकों की महाभारत संहिता रची थी। आश्चर्यजनक बात यह है कि इसका बड़ा हिस्सा देवलोक (30 लाख), पितृ लोक (15 लाख) और गंधर्व लोक (14 लाख) में प्रचलित है। हम मनुष्यों को इसका केवल एक लाख श्लोकों वाला हिस्सा प्राप्त हुआ है, जिसे पंचम वेद भी कहा जाता है।
अष्ट चिरंजीवियों में शामिल और व्यास गद्दी का महत्व महर्षि वेदव्यास जी उन आठ भाग्यशाली विभूतियों में शामिल हैं जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है (अष्ट चिरंजीवी)। आज भी कथावाचक जिस स्थान पर बैठकर ज्ञान देते हैं, उसे 'व्यास गद्दी' कहा जाता है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि 'मुनियों में मैं व्यास हूँ'।
महर्षि वेदव्यास का जीवन हमें सिखाता है कि ज्ञान ही वह प्रकाश है जो अज्ञान के अंधकार को मिटा सकता है। उनके द्वारा रचित महाभारत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है जो हर वर्ण और संप्रदाय के लिए मार्गदर्शक है।

