Srimad Bhagavad Gita: मृत्यु का डर कैसे दूर करें? श्रीमद्भगवद्गीता और आत्मा की अमरता का रहस्य
punjabkesari.in Sunday, Jun 21, 2026 - 02:28 AM (IST)
Srimad Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 22 : जानें कि मृत्यु से डरना क्यों व्यर्थ है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार आत्मा अमर है और मृत्यु केवल एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरण या 'घर वापसी' की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।
‘मौत’ का भय क्यों सताता रहता हर समय
श्रीमद भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान, अर्जुन से कहते हैं :
‘वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥ 2-21॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ 2-22॥’
अर्थात् : हे अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह भला कैसे किसी को मार सकता है और कैसे किसी को मरवा सकता है।

इसके बाद प्रभु अर्जुन से कहते हैं कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा भी पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है।
परमात्मा के इस कथन से इतना तो अवश्य ही स्पष्ट होता है कि ‘मृत्यु, जीवन की ही तरह एक स्वाभाविक घटना है’, अत: हमें मृत्यु से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है पर क्या यह मानना इतना आसान है?
व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो यह बहुत ही कठिन है क्योंकि हम सभी अपने जीवन से बहुत अधिक प्यार करते हैं और इसीलिए ही मृत्यु से हम बहुत डरते हैं।
यह डर केवल हमारा नहीं है, सदियों से हर सभ्यता, हर संस्कृति और हर धर्म ने इस भय से मुक्ति का मार्ग खोजने का प्रयास किया है। फिर भी मनुष्य आज भी उतना ही भयभीत है जितना हजारों वर्ष पहले था, क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर बुद्धि से नहीं, अनुभव से मिलता है।

पर इस डर की वजह क्या? वजह है हमारा अज्ञान, जी हां! यह अज्ञान कोई साधारण भूल नहीं, बल्कि जन्मों से संचित एक गहरी भ्रांति है। जब तक हम अपने आप को अविनाशी आत्मा (देहि) के बजाय विनाशी शरीर (देह) समझते रहेंगे, तब तक हम मृत्यु के इस डर से निजात नहीं पा सकेंगे।
निर्माण और विनाश दोनों ही एक-दूसरे से प्रगाढ़ रूप से सम्बद्ध हैं। जिस तरह बीज गले बिना वृक्ष नहीं होता और फल टूटे बिना बीज नहीं बनता, ठीक उसी तरह से नया जीवन धारण तब ही होता है जब किसी की मृत्यु होती है और मृत्यु भी तब ही होती है जब कोई जीवन नष्ट होता है।
यह प्रकृति का शाश्वत नियम है, यहां कुछ भी बिना कारण नहीं आता और बिना उद्देश्य नहीं जाता। जीवनकाल में जैसे सुख, शांति, लाभ, भोग, ऐश्वर्य प्राप्ति के अवसर आते रहते हैं, वैसे ही कर्म मार्गों के अनुसार एवं परिस्थितियों के अनुसार रोग, हानि, संकट, क्लेश और मृत्यु के अवसर आना भी स्वाभाविक ही है किन्तु देखा जाता है कि लोग सुखी अवसरों का तो प्रसन्नतापूर्वक उपभोग कर लेते हैं पर जब दुख का अवसर आता है तो खूब रोते, चिल्लाते, डरते, कांपते और भयभीत होते रहते हैं।
यह विरोधाभास ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है, क्योंकि हम जीवन के आधे सत्य को स्वीकार करते हैं और आधे से मुंह फेर लेते हैं जबकि जो सुख को स्वीकारता है, उसे दुख को भी उतनी ही सहजता से स्वीकारना चाहिए, यही संतुलन ही वास्तविक परिपक्वता है।
यदि हम सरलतापूर्वक यह समझ लें कि ‘जब से आत्मा शरीर में प्रवेश करती है, तब से जीवन का प्रारंभ होता है और जिस दिन आत्मा पुराना शरीर त्याग देती है, तो जीवन समाप्त हो जाता है’ तो हमारा मृत्यु भय बिल्कुल समाप्त हो जाएगा।

गौर से देखा जाए तो मृत्यु को परिभाषित करने वाले शब्दों से ही यह जाहिर होता है कि मृत्यु शरीर की होती है, न कि आत्मा की। मसलन, जब कोई कहता है कि किसी का देहांत हो गया या देहावसान हो गया, तो उससे यह सिद्ध होता है कि आत्मा ने धारण किया हुआ शरीर त्याग दिया और चूंकि शरीर प्रकृति प्रदत्त है, इसलिए मृत्यु के बाद वह वापस अपने स्रोत में जा मिलता है।
अब जो चीज जिसकी थी, उसी के पास चली गई तो हमारा अर्थात आत्मा का तो उसमें कुछ गया नहीं, तो फिर रोना किस बात का? आत्मा के लिए मृत्यु एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरण ही है, इसलिए न इससे डरने की कोई आवश्यकता है और न रोने का कोई अर्थ क्योंकि स्थानांतरण में विदाई होती है, विनाश नहीं।
स्मरण रहे! हम सभी इस देह में और दुनिया में मेहमान हैं और जो मेहमान होता है, वह जानता है कि यह मेरा स्थान नहीं है, अत: मेरा यहां से जाना निश्चित है और यह लौटना पराजय नहीं, बल्कि एक पूर्णता है। हममें से प्रत्येक का यहां से जाना निश्चित है और जिस लोक से हम आए हैं, वहां लौटना भी निश्चित है।
जिस घर से हम आए हैं, वहां लौटना कोई दुखद घटना नहीं है, यह तो एक लम्बी यात्रा के बाद घर वापसी है और घर वापसी में आंसू नहीं, सुकून होता है। इसीलिए मृत्यु के कितने दिन शेष हैं, वह गिनती करने के बजाय आत्मचिंतन और प्रभु चिन्तन में अपना जीवन व्यतीत कर उसे श्रेष्ठतम बनाने का पुरुषार्थ करें।
-राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज जी
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