जब शब्दों की गरिमा खो जाती है, तो राष्ट्र अपनी आत्मा खो देता है
punjabkesari.in Monday, Aug 03, 2026 - 02:09 AM (IST)
एक राष्ट्र का चरित्र केवल उसकी आर्थिक वृद्धि, सैन्य शक्ति या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं आंका जाता। इसे इस बात से आंका जाता है कि उसके लोग एक-दूसरे से कैसे बात करते हैं, वे अपने बड़ों, शिक्षकों और संस्थानों के प्रति कैसा सम्मान दिखाते हैं और मतभेदों को कितनी गरिमा के साथ संभालते हैं। किसी समाज की भाषा उसकी संस्कृति का दर्पण होती है। जब वह भाषा अपमानजनक और आक्रामक हो जाती है, तो यह केवल शिष्टाचार में गिरावट नहीं, यह एक चेतावनी है कि समाज के भीतर कुछ गहरा बदल रहा है। भारत हमेशा से ज्ञान, आध्यात्मिकता और सहिष्णुता की भूमि के रूप में जाना जाता रहा है। हमारी प्राचीन परंपराओं ने हमें सिखाया कि शब्द पवित्र होते हैं। संतों, दार्शनिकों और विद्वानों का मानना था कि वाणी में संबंध बनाने, संघर्ष सुलझाने और पीढिय़ों को प्रेरित करने की शक्ति होती है। गहन बहसों के दौरान भी जोर ज्ञान, तर्क और आपसी सम्मान पर होता था।दुख की बात है कि वह परंपरा कमजोर होती दिख रहीहै।
आज, अपमानजनक भाषा रोजमर्रा की जिंदगी का एक स्वीकृत हिस्सा बन गई है। किसी भीड़-भाड़ वाली सड़क, बाजार या यहां तक कि कई स्कूलों और कॉलेजों के बाहर चलें, तो ऐसे शब्द सुनने को मिलते हैं, जिन्होंने कभी समाज को चौंका दिया होता। अपशब्दों का प्रयोग लापरवाही से किया जाता है, अक्सर बिना सोचे-समझे। कई लोगों का मानना है कि कठोर बोलने से वे बोल्ड या आधुनिक लगते हैं। वास्तव में, यह न तो आत्मविश्वास को दर्शाता है और न ही ताकत को। यह अधीरता, हताशा और मूल्यों के धीरे-धीरे क्षरण को दर्शाता है। सबसे बड़ी चिंता यह नहीं कि वयस्क ऐसी भाषा का उपयोग करते हैं। बड़ी चिंता यह है कि बच्चे सुन रहे हैं। एक बच्चा स्पंज की तरह होता है।
घर पर, स्कूल में, टैलीविजन पर, फिल्मों में, सोशल मीडिया पर और सार्वजनिक रूप से बोला गया हर शब्द उस दुनिया का हिस्सा बन जाता है, जिसे वे समझने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि माता-पिता पर भारी जिम्मेदारी है। बच्चा सलाह से कहीं अधिक व्यवहार से सीखता है। यदि माता-पिता सम्मानपूर्वक बात करते हैं, तो बच्चे सम्मान ग्रहण करते हैं। यदि असहमति को गुस्से की बजाय धैर्य के साथ संभाला जाता है, तो बच्चे भावनात्मक मजबूती सीखते हैं। स्कूलों को भी एक बार फिर नैतिक शिक्षा, मूल्यों, अनुशासन और नागरिक जिम्मेदारी पर अधिक जोर देना चाहिए। चरित्र के बिना सफलता अधूरी है। मूल्यों के बिना ज्ञान खतरनाक है।
सम्मानजनक भाषा में यह गिरावट केवल सड़कों पर ही नहीं, बल्कि कभी-कभी देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था, संसद में भी दिखाई देती है। लोकतंत्र बहस की मांग करता है। यह सरकार की जांच, मजबूत विपक्ष, कठिन सवालों और ईमानदार आलोचना की मांग करता है। इनके बिना, लोकतंत्र फल-फूल नहीं सकता। लेकिन लोकतंत्र अनुशासन की भी मांग करता है। यह मांग करता है कि बहस हो, तर्क सुने जाएं और संसद चले। दुर्भाग्य से, ऐसे अवसर आते हैं जब चिल्लाना, बार-बार व्यवधान डालना और आरोपों का आदान-प्रदान सार्थक चर्चा पर भारी पड़ता है। तर्कपूर्ण बहस की बजाय, टकराव होता है। मनाने की बजाय,तमाशा होता है। महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, राष्ट्रीय सुरक्षा या किसानों के कल्याण के समाधान पर चर्चा करने की बजाय, कीमती घंटे अव्यवस्था में बर्बाद हो जाते हैं। सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक का है, जिसकी चिंताएं अनसुलझी रह जाती हैं।
एक सिद्धांत राजनीति से ऊपर रहना चाहिए-पीठासीन अधिकारी की गरिमा। जो कोई भी कुर्सी पर बैठता है, वह संस्था की ओर से ऐसा करता है। व्यक्ति बदल सकते हैं, सरकारें बदल सकती हैं और राजनीतिक भाग्य उठ और गिर सकते हैं लेकिन संस्थाएं टिकी रहती हैं। भारत की संसद ने लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ बेहतरीन बहसें दी हैं। अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि के महान नेताओं ने उत्साहपूर्वक असहमति जताई, फिर भी कई लोगों ने संसदीय परंपराओं के लिए उल्लेखनीय शिष्टाचार और सम्मान का प्रदर्शन किया। उन्होंने समझा कि हालांकि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नीतियों पर भिन्न हो सकते हैं लेकिन संस्था को हमेशा पक्षपातपूर्ण हितों से ऊपर रहना चाहिए।
सार्वजनिक विमर्श में गिरावट का समाधान समाज के एक वर्ग को दोष देने में नहीं है। यह सामूहिक आत्मनिरीक्षण में है। माता-पिता को अपने आचरण से सम्मान सिखाना चाहिए। शिक्षकों को शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ-साथ चरित्र का पोषण करना चाहिए। धार्मिक और सामुदायिक नेताओं को करुणा और नागरिकता को प्रोत्साहित करना चाहिए। मीडिया को रेटिंग के लिए संघर्ष को पुरस्कृत करने की बजाय विचारशील संवाद का जश्न मनाना चाहिए। राजनीतिक दलों को, विचारधारा से परे, अपने प्रतिनिधियों को संसदीय व्यवहार के उच्चतम मानकों को बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। सार्वजनिक हस्तियों को याद रखना चाहिए कि लाखों लोग उन्हें देखते हैं, विशेष रूप से युवा दिमाग, जो आदर्शों की तलाश में हैं। सबसे ऊपर, हर नागरिक को बोलने से पहले एक साधारण सवाल पूछना चाहिए-क्या मेरे शब्द समस्या का समाधान करेंगे, या इसे और गहरा करेंगे?
यदि हम भविष्य की पीढिय़ों के लिए एक मजबूत राष्ट्र छोडऩा चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषा में गरिमा और अपने सार्वजनिक जीवन में सम्मान को बहाल करके शुरुआत करनी होगी। जो समाज विनम्रता से बात करता है, वह स्पष्ट रूप से सोचता है। जो संसद अनुशासन के साथ बहस करती है, वह जनता की सेवा अधिक प्रभावी ढंग से करती है और जो राष्ट्र अपने संस्थानों का सम्मान करता है, वह अपने लोकतंत्र को मजबूत करता है। भारत का भविष्य केवल कानूनों, नीतियों या चुनावों के माध्यम से नहीं लिखा जाएगा। यह उन शब्दों के माध्यम से भी लिखा जाएगा जिन्हें हम हर दिन चुनते हैं-हमारे घरों में, हमारी सड़कों पर, हमारी टैलीविजन स्क्रीन पर और संसद के अंदर। जब हमारे शब्द गुस्से से ऊपर उठेंगे और हमारा आचरण विभाजन से ऊपर उठेगा, तो भारत केवल एक मजबूत लोकतंत्र ही नहीं बनेगा, यह एक बेहतर सभ्यता बनेगा।-देवी चेरियन
