Shiv Navratri Ujjain 2026 : महाकाल मंदिर में 11 साल पुरानी हल्दी खेला परम्परा पर संकट, जल्द लग सकता है प्रतिबंध
punjabkesari.in Tuesday, Feb 10, 2026 - 11:05 AM (IST)
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Shiv Navratri Ujjain 2026 : उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर परिसर में महिलाओं द्वारा एक-दूसरे को हल्दी लगाकर नाच-गाना करने की परंपरा इन दिनों विवाद का कारण बन गई है। महाशिवरात्रि से पहले चल रहे महा शिवनवरात्रि पर्व के दौरान इस तरह के आयोजन पर अब मंदिर के पुजारियों ने आपत्ति जताई है और इसे सनातन परंपरा के विरुद्ध बताया है।
मान्यता के अनुसार, शिवनवरात्रि के नौ दिनों में भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया जाता है और महाशिवरात्रि पर उन्हें दूल्हे के रूप में सजाया जाता है। इसी दौरान प्रतिदिन सुबह कोटेश्वर भगवान की पूजा होती है। पूजा के बाद लगभग 50 से 100 महिलाएं मंदिर परिसर में एकत्र होकर भजन-कीर्तन के साथ नृत्य करती हैं और एक-दूसरे को हल्दी लगाकर शिव विवाह का उत्सव मनाती हैं।
मंदिर के पुजारी महेश शर्मा ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि शिवनवरात्रि केवल साधना, पूजा और संकल्प का समय होता है, जो पंचमी तिथि से प्रारंभ होता है। उन्होंने बताया कि शास्त्रों में शिवनवरात्रि को भगवान के प्राकट्य दिवस के रूप में माना गया है, न कि विवाह उत्सव के रूप में। उनके अनुसार, हल्दी खेलना और इसे मनोरंजन का रूप देना धार्मिक परंपराओं के खिलाफ है।
पुजारी का कहना है कि शिव पुराण और अन्य ग्रंथों में इस तरह के आयोजन का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए यह परंपरा धीरे-धीरे गलत दिशा में जा सकती है। इसी कारण उन्होंने मंदिर समिति से इस पर समय रहते रोक लगाने की मांग की है।
मंदिर प्रशासन को भी इस संबंध में कई शिकायतें प्राप्त हुई हैं, जिनमें कहा गया है कि परिसर में परंपराओं के विपरीत गतिविधियां हो रही हैं। इसके बाद प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि जल्द ही इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए आदेश जारी किए जा सकते हैं।
हालांकि मंदिर समिति का कहना है कि कोटेश्वर भगवान को उबटन अर्पित करने की एक प्राचीन परंपरा है। इसी के तहत नौ दिनों तक भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया जाता है और महाशिवरात्रि पर उन्हें दूल्हे की तरह सजाया जाता है। इसी वजह से श्रद्धालु इसे शिव विवाह से जोड़कर देखने लगे हैं।
बताया जाता है कि करीब 11 साल पहले नियमित रूप से दर्शन करने आने वाली कुछ महिलाओं ने हल्दी खेलने की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे यह परंपरा बढ़ती गई और अब ढोल-नगाड़ों के साथ नाच-गाने के रूप में मनाई जाने लगी है। वर्तमान में इसी परंपरा को लेकर मंदिर परिसर में बहस और असहमति का माहौल बना हुआ है।
