Sawan 2026: शिव भक्तों के लिए खुशखबरी! जल्द आ रहा है पवित्र माह सावन, जानें जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त और महत्व
punjabkesari.in Tuesday, Jul 21, 2026 - 03:15 PM (IST)
Sawan 2026: शास्त्रों की मानें तो रुद्राभिषेक अथवा जलाभिषेक करने से भोलेनाथ बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्त की सभी मनोकामनाएं भी सहज ही पूरी कर देते हैं। ज्योतिष शास्त्रानुसार जन्मकुण्डली में जातक के किसी ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा का सदा ही महत्व रहता है क्योंकि इनके अशुभ योग होने पर भगवान शिव की उपासना तथा रुद्राभिषेक करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। सावन के महीने में अनेक वस्तुओं से रुद्राभिषेक करने का विशेष महत्व है।

श्रावण महीने में शिव का जलाभिषेक किया जाता है। भगवान शंकर सिर्फ जल की चार बूंदें चढ़ाने से प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों को चार बूंदों के बदले चार फर्ज-अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष प्रदान करते हैं। भगवान शंकर को जल चढ़ाने से मन को शान्ति मिलती है। दूध या दही की धारा चढ़ाने से संतान प्राप्ति, गन्ने का रस चढ़ाने से लक्ष्मी, शहद चढ़ाने से पैसों की वृद्धि, घी चढ़ाने से ऐश्वर्य और गंगा जल चढ़ाने से मोक्ष मिलता है।
Sawan 2026 Dates 60 दिनों का होगा सावन का उल्लास
साल 2026 में महादेव के भक्तों को उनकी उपासना के लिए लंबा समय मिलने वाला है। पंचांग के अनुसार, सावन माह की शुरुआत 30 जून 2026 से होने जा रही है। आस्था का यह महापर्व 28 अगस्त 2026 तक चलेगा। इस दौरान मंदिरों में 'बम-बम भोले' की गूंज सुनाई देगी और कांवड़ यात्रा की रौनक देखने को मिलेगी।
क्यों खास है सावन का सोमवार?
सावन में सोमवार के व्रत का अत्यधिक महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, जो भक्त सावन के सभी सोमवार का व्रत रखकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस महीने में महादेव पार्वती माता के साथ पृथ्वी का भ्रमण करते हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं।

सावन की प्रमुख तिथियां और अनुष्ठान
सावन प्रारंभ: 30 जून 2026
सावन समापन: 28 अगस्त 2026
शिव को प्रिय अभिषेक
शिवपुराण के अनुसार वेदों का सारतत्व, 'रुद्राष्टाध्यायी' है, जिसमें आठ अध्यायों में कुल 176 मंत्र हैं, इन्हीं मंत्रो के द्वारा 'त्रिगुण' स्वरुप रूद्र का पूजनाभिषेक किया जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि 'शिवः अभिषेक प्रियः' अर्थात शिव को अभिषेक अति प्रिय है।
रुद्राष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के 'शिवसंकल्पमस्तु' आदि मंत्रों से 'गणेश' का स्तवन किया गया है। द्वितीय अध्याय पुरुषसूक्त में नारायण 'विष्णु' का स्तवन है। तृतीय अध्याय में देवराज 'इंद्र' तथा चतुर्थ अध्याय में भगवान 'सूर्य' का स्तवन है। पंचम अध्याय स्वयं रूद्र रूप है तो छठे में सोम का स्तवन है, इसी प्रकार सातवें अध्याय में 'मरुत' और आठवें अध्याय में 'अग्नि' का स्तवन किया गया है। अन्य असंख्य देवी देवताओं के स्तवन भी इन्ही पाठमंत्रों में समाहित है। अतः रूद्र का अभिषेक करने से सभी देवों का भी अभिषेक करने का फल उसी क्षण मिल जाता है।

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