Smile please: मनचाहा काम करने में आ रही है परेशानी, अवश्य पढ़ें ये कथा

punjabkesari.in Wednesday, May 04, 2022 - 09:55 AM (IST)

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ

Religious Katha: एक राजा बड़ा प्रमादी था और सदा विषय भोगों में लगा रहता था। वह अपने राज्य के कार्य में बड़ी लापरवाही रखता। अत: उसका सारा कार्य भी उसके एक मंत्री को ही करना पड़ता था। मंत्री प्रथम तो बेचारा दिन-रात राज्य के कार्य में व्यस्त रहता और कभी राजा के पास किसी आवश्यक कार्य से जाता तो घंटों उसे द्वार पर बिठाए रखा जाता। जैसे-तैसे वह राजा से मिल पाता तो भी वह उससे सीधे मुंह बात न करता और नाना प्रकार से भर्त्सना करने लगता था।

PunjabKesari Religious Katha

यह सब देखकर मंत्री को इन सांसारिक कार्यों से घृणा हो गई। यद्यपि वह राज्य का कर्ता-धर्ता था और उसके पास भी अतुल ऐश्वर्य इकट्ठा हो गया था, किन्तु उसमें तनिक भी सुख नजर नहीं आता था। आखिर उसने सब कुछ छोड़ने का निश्चय किया और एक दिन अपने पुत्रों को आदेश दिया, ‘‘जितना धन ले जा सको, ले जाओ किसी अन्य राजा के राज्य में रहो।’’

पुत्रों ने पिता की आज्ञा का पालन किया और धन लेकर किसी अन्य स्थान पर चले गए। इधर मंत्री ने बचा हुआ धन गरीबों में बांट दिया और स्वयं चुपचाप जंगल की ओर चल दिया। वहां जाकर उसने घास-फूस की एक छोटी-सी झोंपड़ी बनाई और उसमें रह कर तप करने लगा।

जब दो-चार दिन बाद उस विषयी राजा के राज्य में मंत्री के न होने से बड़ी अव्यवस्था हो गई तो राजा को अंतत: मंत्री का ध्यान आया। उसने अपने कर्मचारी मंत्री को बुलाने के लिए भेजे किन्तु उन्होंने लौटकर यही उत्तर दिया, ‘‘मंत्री तो संन्यासी बन गया है और तपस्या करने में लग गया है।’’

तब राजा स्वयं जंगल में मंत्री के पास गया और बोला, ‘‘मंत्रीवर! तुम तो इतने बड़े राज्य के प्रमुख कर्ता-धर्ता थे तथा प्रचुर धन तुम्हारे पास था। फिर संन्यासी क्यों हो गए? इस तपस्या में लग जाने से तुम्हें क्या हासिल हुआ?’’

PunjabKesari Religious Katha

मंत्री ने उत्तर दिया, ‘‘महाराज! मेरे संन्यासी बनने और तप करने से प्रथम तो यही हुआ कि जहां मैं आपके द्वार पर घंटों बैठा रहता था और आप दर्शन भी नहीं देते थे, आज स्वयं ही चलकर मेरे पास आए हैं।’’ 

‘‘वह केवल मेरे दो-चार दिन के तप का ही फल है। अधिक करने पर क्या लाभ होगा यह अगला समय बताएगा किन्तु यह तो निश्चय है कि धन-वैभव और विषय-भोगों का त्याग कर देने पर तुरन्त ही शुभ फल की प्राप्ति होने लगती है।’’ 

‘‘जब तक मैं आपका मंत्री बनकर इन सांसारिक सुखों का सुख भोगता रहा, मुझे एक दिन के लिए भी शांति नहीं हुई पर आज सबको छोड़ देने से मैं अपने आपको हल्का मानता हूं तथा मेरा चित्त बड़ी शांति का अनुभव करता है।’’ 

‘‘वास्तव में ही इंद्रियों का दास बनने से बढ़ कर संसार में और कोई दुख नहीं है इसलिए मैं सब छोड़ कर तप तथा आराधना में लग गया हूं और अब आपके राज्य में लौटकर नहीं आऊंगा।’’

मंत्री की बातें सुनकर राजा की भी आंखें खुल गईं। वह भी अपने पुत्र को राज्य सौंप कर साधु बन गया तथा अपने मन और इंद्रियों का पूर्णत-वश में करके तपश्चर्या में लीन हो गया।

PunjabKesari Religious Katha


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Writer

Niyati Bhandari

Related News

Recommended News