Rani of Jhansi: स्वतंत्रता संग्राम की पहली वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का जीवन कैसे बना देश भक्ति का प्रतीक, पढ़ें कहानी
punjabkesari.in Saturday, Nov 29, 2025 - 09:23 AM (IST)
Rani Lakshmi Bai: झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने यह सिद्ध कर दिया कि नारी केवल घर और परिवार की मर्यादा की रक्षक नहीं बल्कि साहस, वीरता और समर्पण की प्रतिमूर्ति बनकर रणभूमि में शत्रु का मुकाबला करने की पूरी क्षमता भी रखती है। कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ उनके अदम्य साहस और बलिदान की गाथा है। वह न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पहली वीरांगना थीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण की मिसाल भी बनीं। उनका जन्म 19 नवम्बर, 1828 को वाराणसी में हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था, जिसे प्यार से मनु कहा जाता था। वह एक सुसंस्कृत और वीर बालिका थीं, जिन्होंने बचपन में ही शास्त्रों की शिक्षा के साथ-साथ शस्त्र चलाने और घुड़सवारी में भी निपुणता प्राप्त की। 7 साल की उम्र में उन्होंने घुड़सवारी सीखी और तलवारबाजी व धनुर्विद्या में भी दक्ष हो गईं।

1842 में उनका विवाह झांसी के मराठा शासक गंगाधर राव से हुआ और वह झांसी की रानी बन गईं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। 1851 में उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन 4 महीने की उम्र में ही उसका निधन हो गया। रानी ने राजा गंगाधर राव के निधन के बाद दत्तक पुत्र के रूप में दामोदर राव को गोद ले लिया।
अंग्रेजों ने राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद झांसी पर कब्जा करने की साजिशें शुरू कर दीं। 27 फरवरी, 1854 को लॉर्ड डलहौजी ने गोद की नीति के तहत दामोदर राव को अस्वीकृत कर दिया और झांसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने का निर्णय लिया।

रानी लक्ष्मीबाई ने घोषणा की कि वह अपनी झांसी नहीं देंगी और उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का संकल्प लिया। उन्होंने अपने किले की रक्षा को मजबूत किया और 14,000 सशस्त्र सैनिकों की एक बड़ी फौज तैयार की, जिसमें महिलाओं को भी शस्त्र चलाने और युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, झांसी एक प्रमुख युद्ध भूमि बन गई। रानी ने अपनी वीरता से कई आक्रमणों को नाकाम किया। मार्च 1858 में ब्रिटिश सेना ने झांसी पर हमला किया लेकिन रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी सेना के साथ किले की रक्षा करते हुए 7 दिन तक साहसपूर्वक युद्ध किया। अंतत: अंग्रेजों ने किले की दीवारों में सेंध लगाकर उस पर कब्जा कर लिया लेकिन रानी दामोदर राव को लेकर सुरक्षित स्थान पर भाग निकलीं।
रानी लक्ष्मीबाई ने तात्या टोपे के साथ मिलकर ग्वालियर किले पर कब्जा किया। 17 जून, 1858 को रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांधकर अंतिम युद्ध के लिए निकलीं। 18 जून, 1858 को ग्वालियर के पास अंग्रेजों से लड़ते हुए वह शहीद हो गईं। उनका जीवन त्याग, साहस और देशभक्ति का प्रतीक बन गया।

