Ramayan Mystery: क्या माता सीता थीं रावण की पुत्री? रामायण की है यह रहस्यमयी कथा
punjabkesari.in Thursday, Feb 05, 2026 - 10:28 AM (IST)
Ramayan Mystery: रामायण में माता सीता को भगवान श्रीराम की पत्नी और राजा जनक की दत्तक पुत्री के रूप में जाना जाता है। उन्हें भूमिसुता कहा गया है क्योंकि उनका प्राकट्य धरती से हुआ था। लेकिन रामकथा से जुड़ा एक ऐसा रहस्यमयी और कम चर्चित प्रसंग भी है, जो पारंपरिक मान्यताओं से बिल्कुल अलग कहानी प्रस्तुत करता है।
अद्भुत रामायण में माता सीता के जन्म को लेकर एक चौंकाने वाला उल्लेख मिलता है। इस ग्रंथ के अनुसार, माता सीता का जन्म रावण और उनकी पत्नी मंदोदरी से जुड़ा हुआ बताया गया है। यह कथा जितनी रहस्यमयी है, उतनी ही रोमांचक भी।

Ramayan Unknown Facts: सीता के जन्म से जुड़ी अनसुनी कथा
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, राजा जनक को खेत जोतते समय भूमि से एक कन्या प्राप्त हुई, जिसे उन्होंने सीता नाम दिया और पुत्री के रूप में स्वीकार किया। लेकिन अद्भुत रामायण इस कथा को एक अलग ही दिशा में ले जाती है।
इस ग्रंथ के अनुसार, माता सीता का जन्म लंका में रावण के महल से जुड़ा हुआ था, हालांकि उनका पालन-पोषण मिथिला में हुआ।

ऋषियों का रक्त और विनाश का श्राप
कथा के अनुसार, अपने अहंकार और शक्ति के मद में चूर रावण ऋषि-मुनियों पर अत्याचार करता था। वह अनेक ऋषियों की हत्या कर उनका रक्त एक कलश में एकत्र करता था। इसी दौरान ऋषि कुत्सा, देवी लक्ष्मी को पुत्री रूप में प्राप्त करने के लिए विशेष मंत्रों के साथ दूध को एक कलश में अभिमंत्रित कर रहे थे। रावण ने वह दूध भी छलपूर्वक अपने रक्त से भरे कलश में मिला दिया।
ऋषियों ने इस घोर अधर्म से क्रोधित होकर रावण को श्राप दिया कि “यही कलश और इसमें मौजूद तत्व एक दिन तेरे विनाश का कारण बनेंगे, और तेरी ही पहली संतान तेरे अंत की आधारशिला बनेगी।”
मंदोदरी का निर्णय और गर्भधारण का रहस्य
रावण ने उस कलश को विष बताते हुए अपनी पत्नी मंदोदरी को सौंप दिया। समय बीतने के साथ रावण के अत्याचारों से दुखी होकर मंदोदरी ने आत्महत्या का निश्चय किया।
उन्होंने उसी कलश को विष समझकर पी लिया, लेकिन चमत्कारिक रूप से उनकी मृत्यु नहीं हुई। ऋषियों द्वारा अभिमंत्रित दूध और दैवीय संयोग के कारण मंदोदरी गर्भवती हो गईं। लोक-लाज, भय और रावण के क्रोध से डरकर मंदोदरी ने इस गर्भ को स्वीकार न करने का निर्णय लिया।

मिथिला की धरती और सीता का प्राकट्य
कथा के अनुसार, मंदोदरी लंका से दूर मिथिला पहुंचीं और नवजात कन्या को एक कलश में रखकर भूमि में गाड़ दिया। उसी समय मिथिला में भयंकर अकाल पड़ा हुआ था।
ऋषियों की सलाह पर राजा जनक स्वयं हल चलाने निकले। तभी हल का अग्रभाग भूमि में दबे उस कलश से टकराया। जब राजा जनक ने उसे बाहर निकाला, तो उसमें एक दिव्य और अत्यंत सुंदर कन्या प्राप्त हुई।
हल (सीत) से उत्पन्न होने के कारण राजा जनक ने उसका नाम सीता रखा और उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया।
रावण के विनाश का कारण बनीं माता सीता
अद्भुत रामायण के अनुसार, माता सीता रावण के कर्मों और ऋषियों के श्राप का ही परिणाम थीं। जन्म से वे मंदोदरी की पुत्री और तकनीकी रूप से रावण की संतान थीं, लेकिन भूमि से प्रकट होने के कारण वे भूमिसुता कहलाईं।
जैसा कि ऋषियों ने श्राप दिया था, अंततः माता सीता ही रावण के विनाश का प्रमुख कारण बनीं। श्रीराम द्वारा रावण वध और लंका विनाश इसी दैवीय योजना की परिणति था।
क्या कहता है शास्त्रों का मत?
यह कथा वाल्मीकि रामायण में नहीं, बल्कि अद्भुत रामायण जैसे उत्तरकालीन ग्रंथों में मिलती है। विद्वानों के अनुसार, यह कथा प्रतीकात्मक और दार्शनिक है, जो कर्म, अधर्म और दैवी न्याय के सिद्धांत को दर्शाती है।

