Navratri 2026: नवरात्रि में क्यों होता है कन्या पूजन? जानें इसकी शुरुआत की कथा और 2 से 10 साल की कन्याओं के नाम
punjabkesari.in Friday, Mar 13, 2026 - 11:34 AM (IST)
Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस दौरान भक्त नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत रखते हैं। साल 2026 में चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च को रामनवमी के दिन समाप्त होगी।
नवरात्रि के अंतिम दिनों में कन्या पूजन (कन्या भोज) का विशेष महत्व होता है। इस दिन छोटी कन्याओं को देवी दुर्गा का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें हलवा, पूड़ी व चने का प्रसाद खिलाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि कन्याओं की पूजा करने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। आइए जानते हैं कि कन्या पूजन की परंपरा कब से शुरू हुई और 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को क्या कहा जाता है।

नवरात्रि में क्यों किया जाता है कन्या पूजन
हिंदू धर्म में कन्या को शक्ति का स्वरूप माना जाता है। नवरात्रि के दौरान 2 से 9 वर्ष तक की कन्याओं की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। इन कन्याओं को मां दुर्गा के विभिन्न रूपों का प्रतीक माना जाता है।
कन्या पूजन के दौरान कन्याओं के पैर धोकर उन्हें सम्मानपूर्वक आसन पर बैठाया जाता है। इसके बाद उन्हें हलवा-पूड़ी और चने का प्रसाद खिलाया जाता है और उपहार देकर विदा किया जाता है। इसे देवी का प्रसाद माना जाता है।

मार्कंडेय पुराण में मिलता है कन्या पूजन का उल्लेख
धार्मिक ग्रंथ मार्कंडेय पुराण में कन्या पूजन का विस्तृत वर्णन मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार देवी दुर्गा ने बाल रूप में कई असुरों का वध किया था, जो देवताओं और मनुष्यों के लिए खतरा बन चुके थे। इसी कारण कन्याओं को देवी दुर्गा का रूप माना गया और उनकी पूजा करने की परंपरा शुरू हुई। देवी भागवत पुराण में भी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है।
देवी कात्यायनी से जुड़ी है कन्या पूजन की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार कात्य वंश के ऋषि कात्यायन ने देवी भगवती की कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनसे कहा कि वह उनकी पुत्री के रूप में जन्म लेना चाहती हैं।
समय आने पर देवी ने उनके घर जन्म लिया और कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुईं। माना जाता है कि महिषासुर को वरदान मिला था कि उसका वध केवल एक कुंवारी कन्या के हाथों होगा। तब देवी ने कन्या रूप में जन्म लेकर महिषासुर का अंत किया। इसी घटना के बाद कन्या पूजन की परंपरा को विशेष महत्व मिला।

कन्या पूजन की परंपरा कब से मानी जाती है
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कन्या पूजन की परंपरा प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह परंपरा 14वीं से 16वीं सदी के दौरान अधिक प्रचलित हुई। कहा जाता है कि देवी के असुरों से युद्ध के समय भी ऋषि कात्यायन ने उन्हें देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की थी। उन्होंने देवी को मधुपर्क (दही और शहद का मिश्रण), गन्ने का रस और सात्विक भोजन अर्पित किया था।
2 से 10 वर्ष की कन्याओं को क्या कहा जाता है
शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि में छोटी कन्याओं को देवी के अलग-अलग स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है। हर आयु की कन्या एक विशेष शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है।
2 वर्ष की कन्या – कुमारी
3 वर्ष की कन्या – त्रिमूर्ति
4 वर्ष की कन्या – कल्याणी
5 वर्ष की कन्या – रोहिणी
6 वर्ष की कन्या – कालिका
7 वर्ष की कन्या – चंडिका
8 वर्ष की कन्या – शांभवी
9 वर्ष की कन्या – दुर्गा
10 वर्ष की कन्या – सुभद्रा
इन सभी रूपों की पूजा करने से देवी दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।
कन्या पूजन का धार्मिक महत्व
नवरात्रि में कन्या पूजन को देवी शक्ति की आराधना का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि छोटी कन्याओं में देवी का वास होता है। इसलिए श्रद्धा और सम्मान के साथ कन्याओं की पूजा करने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और भक्तों के जीवन से कष्ट, बाधाएं और नकारात्मकता दूर हो सकती है।

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
