Muni Shri Tarun Sagar: केवल मां के पेट से बाहर आ जाना ही जन्म नहीं है

punjabkesari.in Thursday, May 05, 2022 - 09:16 AM (IST)

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
अपने भीतर का प्रभु 
भूख लगे तो खाना प्रकृति है। भूख न लगे तो खाना विकृति है और स्वयं भूखे रह कर किसी भूखे को खिला देना संस्कृति है। 
भोजन यह सोच कर मत करो कि मैं खा रहा हूं बल्कि यह सोच कर करो कि मेरे भीतर जो मेरा प्रभु विराजमान है, उसे मैं अर्घ्य चढ़ा रहा हूं। 

यह सोच कर भोजन करोगे तो कभी मांस, मदिरा और जर्दा आदि नहीं खा सकोगे। क्या तुम परमात्मा को इनका भोग लगाते हो? नहीं! तो फिर इन्हें पेट में डालकर अपने भीतर बैठे प्रभु को अपमानित क्यों करते हो?

जो है उसका आनंद लो
दुनिया का एक सीधा-सा नियम है- यहां इंसान को ‘कुछ’ मिल सकता है। जोर लगाओ तो ‘कुछ-कुछ’ भी  मिल सकता है। किस्मत साथ दे तो ‘बहुत-कुछ भी’ मिल सकता है लेकिन ‘सब कुछ’ कभी भी और किसी को भी नहीं मिलता। 

इसलिए सब कुछ पाने और सब कुछ होने के पीछे पागल मत बनो। जो तुम्हारे पास है उसका आनंद लो, जो पड़ोसी के पास है, उसे देख कर दुखी मत होओ। दुखी होने से आखिर पड़ोसी तुम्हें कुछ दे तो नहीं देगा न! 

पेट से बाहर आना ही जन्म नहीं
एक छोटी कहानी है। एक बुढ़िया थी। वह बचपन में ही मर गई। जब कभी मैं यह कहानी कहता हूं तो लोग हंसते हैं और पूछते हैं कि बुढ़िया थी तो बचपन में कैसे मर गई और बचपन में मर गई तो बुढ़िया कैसे हुई? 

मैं कहता हूं, ‘‘जन्म को जीवन मत समझ लेना। जो उम्र केवल खाने, पीने और सोने में निकल गई, उसका क्या मूल्य है ? व्यक्ति का असली जन्म तो उस दिन होता है जब उसे अपने ‘अस्तित्व’ का बोध होता है और जीवन में धर्म-ध्यान शुरू हो जाता है। केवल मां के पेट से बाहर आ जाना ही जन्म नहीं है।’’


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Content Writer

Niyati Bhandari

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