Mantra Jaap: मंत्रों को ऊर्जावान बनाने के बाद ही मिलता है पूरा लाभ

punjabkesari.in Wednesday, May 18, 2022 - 02:52 PM (IST)

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Mantra Jaap: मंत्रों का विज्ञान बहुत विचित्र है। यह तो ऐसा है मानो जैसे एक आलू को अलग-अलग सब्जियों के साथ मिलाने से अलग-अलग स्वाद देता है। ऐसे ही मंत्र तो एक ही होता है पर उसको शरीर के अलग-अलग चक्रों से, प्राणों से और इंद्रियों से उच्चारण करने से उसका आनंद और फल अलग- अलग होता है। अब समस्या आती है कि जब आप मंत्र करने बैठते हो या पूजा करने बैठते हो तो आपका मन भटकता है। आपका चित्त एकाग्र नहीं हो पाता है इसलिए सबसे पहले मन को अंतकरण में चित में और शरीर में बार-बार भ्रमण कराने की कोशिश करनी चाहिए। आपका मन आपके शरीर से बाहर न जा पाये। अगर मन को शरीर में रहने की आदत हो गयी तो आपके लिए मंत्र जाप करना और पूजा करना या तपस्या करना बहुत ही आसान हो जाएगा । 

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हमारे शरीर में 5 प्राण, 7 चक्र और 5 इंद्री ये ऊर्जा के स्रोत होते हैं । ये ऊर्जा बाहर से लेते हैं तथा 5 कर्मेन्द्रिय ऊर्जा विसर्जन के स्रोत होते हैं । मंत्र जाप करने से शरीर में ऊर्जा बढ़ती है। अगर ऊर्जा बढ़ेगी तो शरीर निरोगी रहेगा। अगर शरीर निरोगी रहेगा तो आयु बढ़ेगी और आयु बढ़ेगी तो आप लोगों का कल्याण कर सकते हो। मंत्रों का उच्चारण आप 5 प्राण, 5 इंद्री, 7 चक्र और एक जिव्हा से कर सकते हो । जिव्हा से किया हुआ मंत्र तो मानो जैसे आपने अपने घर में एक मंत्र की ऑडियो सीडी लगा रखी है । उसका आपको कोई लाभ नहीं मिलेगा तथा आपका हमेशा मन भटकता ही रहेगा। सबसे पहले आपको मंत्रो को अपने अंतःकरण में करने का अभ्यास करना चाहिए। ये सभी अभ्यास आपको कम से कम 1 महीने अवश्य करने चाहिए। 

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Om Mantra Jaap: एक महीने आप ॐ का लंबा उच्चारण मूलाधार चक्र से प्रारम्भ करना चाहिए। ऐसा करने से आपका मूलाधार चक्र ऊर्जावान हो जाएगा। फिर आपको नाभि चक्र से ॐ का उच्चारण करना चाहिए । ऐसा करने से आपके शरीर की 72,72 10,202 नस और नाड़ियां ऊर्जावान हो जाएंगी। फिर धीरे-धीरे सभी चक्रों और 5 प्राणों और 5 इंद्रियों से ॐ का उच्चारण करना चाहिए । ऐसा करने से आपके शरीर के 17 ऊर्जा के केंद्र ऊर्जावान हो जाएंगे। 

अगर आपको भूख और प्यास भी लगती है तो ये ऊर्जा के केंद्र तपस्या के समय आपको ऊर्जा की आपूर्ति करेंगे। इतना अभ्यास करने के बाद आप किसी एक मंत्र को आप सिद्ध करने के लिए चुन सकते हैं । उस मंत्र को आप अपने त्रिवेणी चक्र यानि दोनों आंखों के बीच में नाक के ऊपर लेकर आएं । फिर उस मंत्र के एक-एक शब्द को दोनों बंद आंखो से धीरे-धीरे पढ़ना चाहिए और उच्चारण करते रहना चाहिए। आपकी सारी इंद्रिय और मन इस मंत्र पर काम करना शुरू कर देंगे। ऐसी स्थिति में अगर मन भटकने की कोशिश भी करेगा तो आपका मंत्र मन को भटकने नहीं देगा। बस इसी मंत्र को बार-बार करते जायें तो आपका मन और आपकी इंद्री आपके बस में होंगी । बस यह आपकी तपस्या का पहला पड़ाव है । 3 वर्ष तक कड़ा अभ्यास करने से आप किसी भी एक मंत्र को सिद्ध कर सकते हैं । यह अभ्यास एकांत में ही होना चाहिए नहीं तो आपका स्रोत और स्पंदन इंद्री हमेशा भटकती रहेगी।

डॉ एच एस रावत (सनातन धर्म चिंतक)

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Content Writer

Niyati Bhandari

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