Maa Shakumbhari ki kahani: पौष पूर्णिमा पर हुआ था माता शाकंभरी का दिव्य प्राकट्य, पढ़ें कथा

punjabkesari.in Friday, Jan 02, 2026 - 12:15 PM (IST)

Shakambhari Devi Story: हिंदू धर्म में माता शाकंभरी को आदिशक्ति दुर्गा का अत्यंत करुणामय और लोककल्याणकारी स्वरूप माना गया है। पौष मास की पूर्णिमा को माता शाकंभरी की जयंती मनाई जाती है, जिसे शाकंभरी पूर्णिमा कहा जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि प्रकृति, अन्न और जीवन के संरक्षण का भी संदेश देता है।

Shakambhari Devi Story

शाकंभरी नवरात्र और पौराणिक महत्व
धर्मशास्त्रों के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शाकंभरी नवरात्र आरंभ होते हैं, जो पूर्णिमा तक चलते हैं। इस अवधि में तंत्र-साधना, मंत्र-जप और देवी आराधना का विशेष महत्व है। देवी शाकंभरी को वनस्पति और अन्न की देवी माना गया है।

देवी शाकंभरी का स्वरूप (शास्त्रीय वर्णन)
दुर्गा सप्तशती के मूर्ति रहस्य में देवी शाकंभरी का स्वरूप अत्यंत मनोहारी बताया गया है। उनका वर्ण नील है, नेत्र नील कमल के समान हैं। वे कमल पर विराजमान होती हैं। एक हाथ में कमल पुष्प और दूसरे में बाणों से भरा तरकश धारण करती हैं। यह स्वरूप शक्ति और करुणा का अद्भुत संतुलन दर्शाता है।

शाकंभरी कथा: दुर्गम दैत्य का वध
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय दुर्गम नामक दैत्य ने चारों वेद चुरा लिए और उसके आतंक से पृथ्वी पर सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। अन्न-जल के अभाव में जीव-जंतु और मानव त्राहिमाम करने लगे। तब देवी दुर्गा ने शाकंभरी रूप धारण किया। देवी ने दुर्गम दैत्य का वध कर वेदों को देवताओं को लौटाया। उनके सौ नेत्रों से करुणा दृष्टि पड़ते ही पृथ्वी पुनः हरी-भरी हो गई। नदियां बहने लगीं, वृक्ष फल-फूल और औषधियों से भर गए। इसी कारण देवी को शताक्षी भी कहा जाता है।

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शाकंभरी नाम का रहस्य
देवी ने अपने शरीर से उत्पन्न शाक (हरी सब्जियां, वनस्पति) द्वारा संसार का पालन किया। इसी कारण उनका नाम शाकंभरी पड़ा, अर्थात जो शाक से पृथ्वी का पोषण करे।

धार्मिक मान्यता और दान का महत्व
शाकंभरी पूर्णिमा के दिन अन्न, फल, शाक, जल और वस्त्र का दान विशेष पुण्यदायी माना गया है। गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा से माता शाकंभरी अत्यंत प्रसन्न होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

माता शाकंभरी की कथा हमें यह सिखाती है कि प्रकृति, अन्न और जल का सम्मान ही जीवन का आधार है। यह पर्व आध्यात्मिक चेतना के साथ-साथ सामाजिक और पर्यावरणीय संतुलन का भी संदेश देता है।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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