Mahashivratri 2020: कैसे शुरू हुई रुद्राभिषेक की परंपरा?

2020-02-15T13:42:58.863

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
जैसे कि सब जानते हैं महाशिवरात्रि का पर्व आने वाला है। हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष फाल्गुन माह की कुष्ण पक्ष की चौदश यानि चतुर्दशी तिथि को ये त्यौहार मनाया जाता है इस बार 21 फरवरी, 2020 को मनाया जाएगा। इस दौरान एक तरफ़ शिवालय में भोलेनाथ के भक्तों की भीड़ देखने को मिलती है। तो दूसरी ओर बहुत से लोग कांवड़ यात्रा पर जाते हैं। इसके अलावा लोग इस शुभ अवसर  पर शिव शंकर के दर्शन करने के लिए देश में स्थित इनके विभिन्न मंदिरों में जाकर शिव जी के लिंग रूप की पूजा-अर्चना के साथ-साथ अभिषेक करते हैं। शिव पुराण में किए वर्णन के अनुसार गंगाधर शिव शंभू को प्रसन्न करने का सबसे सरल व सटीक तरीका है उनका अभिषेक। जिसमें सबसे अधिक महत्व रूद्राभिषेक का होता है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि पर ज्योतिषियों की मदद से विधिवत इनका रूद्राभिषेक करते हैं ताकि उन पर शिव जी की असीम कृपा बरसे। मगर अभिषेक क्या है, और इसे करने से किस-किस तरह के लाभ प्राप्त होते हैं?
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अगर आपके मन में ये अपने इन प्रश्नों के उत्तर जानने की इच्छा है तो चलिए आज आपको इसी बारे में जानकारी देते हैं कि शास्त्रों में इसका क्या महत्व है। रूद्राभिषेक के बारे में जानने से पहले आपको ये जानना होगी कि अभिषेक का क्या मतलब होता है। शास्त्रों के अनुसार अभिषेक का तात्पर्य स्नान करवाने से होता है। यानि रुद्राभिषेक का मतलब हुआ रुद्र अर्थात शिव शंकर के लिंग रूप, शिवलिंग का रूद्र के मंत्रों का उच्चारण करते हुए अभिषेक। ब्राह्मणों के अनुसार रुद्राभिषेक शिव जी को प्रसन्न करने का सबसे श्रेष्ठ तरीका यही है। अगर आज के समय की बात करें तो साधारण अभिषेक रुद्राभिषेक के रूप में ही विश्रुत है। परंतु ज्योतिष शास्त्र में अभिषेक के कई रूप व प्रकार बताए गएं हैं।
 

कैसे आरंभ हुआ रुद्राभिषेक
धार्मिक कथाओं की मानें तो भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई थी। जब ब्रह्माजी भगवान विष्णु के पास अपने जन्म का कारण पूछने गए तो उन्होंने उन्हें उनकी उत्पत्ति का रहस्य बताया। लेकिन ब्रह्मा जी मानने ये मानने को तैयार ही नहीं थे कि उनकी उत्पत्ति का कारण भगवान विष्णु है। जिस कारण दोनों में भयानक युद्ध हुआ। जिससे क्रोधित होकर भगवान रुद्र लिंग रूप में प्रकट हुए। कहा जाता है जब ब्रह्मा जी तथा भगवान विष्णु दोनों को इस लिंग का आदि और अन्त पता नहीं चल पाया तो उन्होंने हार मान ली और लिंग का अभिषेक किया। जिससे भगवान रुद्र प्रसन्न हो गए। ऐसा कहा जाता है कि इसके बाद से ही रूद्राभिषेक की परंपरा प्रचलन में आई।  

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इसलिए ज़रूरी है रुद्राभिषेक
लगभग प्रत्येक ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि शिव जी से ही दुनिया है और एक दिन समस्त संसार इनमें ही मिल जाएगा। रुद्राष्टाध्यायी के अनुसार शिव ही रुद्र हैं और रुद्र ही शिव हैं।

इस संदर्भ में लिखित श्लोक के अनुसार- "रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र।"

भगवान शिव का रुद्र रूप मानव जीवन के सभी दुखों को जल्द ही खत्म कर देते हैं। तो इसका अर्थात हुआ कि जो जातक विधि-विधान के अनुसार रुद्राभिषेक करता है उसके सभी दुख खत्म होते हैं। क्योंकि कहा जाता है जो भी दुख व्यक्ति सह रहे होते हैं उसका कारण भी व्यक्ति स्वंय ही होता है। जाने-अनजाने में की गई इन्हीं गलतियों के परिणामस्वरूप मानव दुख भोगता है।

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Jyoti

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