अगर पूजा में नहीं किया इस मंत्र का जाप तो अधूरी है आपकी अर्चना

11/17/2019 1:49:59 PM

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार मंत्र वह ध्वनि है जो अक्षरों एवं शब्दों के समूह से बनती है। कहा जाता है। मंत्र भी एक प्रकार की वाणी है, परंतु साधारण वाक्यों के समान ये हमको बंधन में डालते नहीं, बल्कि बंदन से मुक्त करवाते हैं। मंत्र मात्र वह ध्वनियां नहीं हैं जिन्हें हम कानों से सुनते हैं, यह ध्वनियां तो मंत्रों का लौकिक स्वरूप हैं। यही कारण है किसी भी धार्मिक पूजा पाठ, कथा या अन्य संस्कार पूजा विधान में आरती के बाद मंत्र उच्चारण का बड़ा महत्व है। आज हम आपको एक ऐसे ही मंत्र के बारे में बताने जा रहे हैं जो मंत्र कम बल्कि एक स्तुति के रूप में जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हर तरह के धार्मिक कार्य में इसका जाप करना अति आवश्यक होता है। यूं तो देवी देवताओं की दैनिक या अन्य पर्व त्यौहारों में होने वाली पूजा में लोग कुछ विशेष मंत्रों का उच्चारण अनिवार्य रूप से करते ही हैं। परंतु इस मंत्र के लिए कहा जाता है पूजा पाठ, यज्ञ या विशेष आरती समाप्त होने के बाद अगर इस अलौकिक मंत्र का उच्चारण नहीं किया जाता तो संपूर्ण पूजा-पाठ अधूरी मानी जाती है। तो आइए जानते हैं पूजा आदि के बाद आरती करके कौनसी स्तुति का पाठ करना अनिवार्य होता है। बता दें शास्त्रों में इस मंत्र को भगवान शिव जी का अति प्रिय मंत्र बताया गया है, जो इस प्रकार है-
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स्तुति मंत्र
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि।।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अलौकिक मंत्र के प्रत्येक शब्द में भगवान शिव जी की स्तुति की गई है। इसका अर्थ इस प्रकार है

कर्पूरगौरं- कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले।

करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार है।

संसारसारं- समस्त सृष्टि के जो सार है।

भुजगेंद्रहारम्- जो सांप को हार के रूप में धारण किए हुए हैं।
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सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभावनी सहितं नमामि- इसका अर्थ है जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है।

अर्थात- जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार है, संसार के सार है और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है।

क्या है इस मंत्र का महत्व-
कर्पूरगौरम् करुणावतारं मंत्र जाप करने के पीछे बहुत गहरे अर्थ छिपे हुए हैं। कहा जाता है भगवान शिव की ये स्तुति शिव-पार्वती विवाह के समय श्री हरि विष्णु द्वारा की गई थी। ये स्तुति इसलिए गाई जाती है कि जो इस समस्त संसार के अधिपति हैम, वो हमारे मन में वास करें, शिव श्मशान वासी हैं, जो मृत्यु के भय को दूर करते हैं। ऐसे शिवजी हमारे मन में शिव वास कर, मृत्यु का भय दूर करें और हमारी समस्त इच्छाओं को पूर्ण करें।
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Jyoti

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