मंदिर ही नहीं इस दरगाह पर भी मनाया जाता है कान्हा के जन्म का जश्न

9/12/2019 1:42:35 PM

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कान्हा, ये तो नाम ही ऐसा है कि जिसके कानों में पड़ते ही इंसान एक अनोखी ही प्रीति में खो जाता है और ये प्रीति है कान्हा की। धार्मिक ग्रथों के अनुसार कन्हैया प्रेम के अवतार हैं। यही कारण है कि चाहे हिंदू हो या मुस्लिम हर कोई इनके प्यार की मिसालें देता है और चाहकर भी इनसे दूर नही रहा पाता। आज हम आपको श्री श्री कृष्ण के एक ऐसे ही मंदिर के बारे में बतान जा रहे हैं जहां हर साल कान्हा के जन्म की खुशी एक दरगाह पर मनाई जाती है। इससे पहले कि आप सोचने लगे कि आख़िर ऐसा कौन सी जगह है तो बता दें हम बात कर रहे हैं कि राजस्‍थान के झूंझनू जिले के नरहड़ कस्‍बे में स्थापित दरगाह की, जहां श्रीकृष्‍ण के जन्‍म पर न केवल खुशियां मनाई जाती हैं बल्कि उनके प्रेम में सूफी गीत भी गाए जाते हैं। कन्‍हैया को रिझाने में न केवल सनातन धर्म बल्कि मुस्लिम समुदाय के भी लोग शि‍रकत करते हैं।
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बता दें राजस्‍थान में स्थित बाबा हाजीब शकरबार शाह की दरगाह अनेकता में एकता की अद्भुत मिसाल देखने को मिलती है। बताया जाता है यहां जितनी शिद्दत से उर्स मनाते हैं उतनी ही आस्‍था से जन्‍माष्‍टमी का पर्व भी मनाया जाता है। हम जानते हैं आप में से बहुत से ऐसे लोग होंगे जिन्हें इस बात पर यकीन नहीं होगा हो मगर ये सच है। यहां दरगार पर श्रीकृष्‍ण के जन्‍म को सभी धर्मों के लोग एक साथ मनाते हैं।

बताया जाता है श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी के मौके पर बाबा हाजीब शकरबार शाह की दरगाह पर तीन दिनों के मेले का आयोजन किया जाता है। हालांकि यह परंपरा कब से शुरू हुई है इस बात का तो कोई साक्ष्‍य नहीं है, परंतु एक अरसे से इसे निभाया जा रहा है। तीन दिन के इस मेले में दूर-दूर से दर्शनार्थी और आते हैं और कृष्‍ण जन्‍म की खुशियां मनाते हैं।
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मेले में पूरी रात्रि भगवान कृष्‍ण के लिए सूफी गीत गाए जाते हैं। इसमें उनके स्‍वरूप और प्रेम का वर्णन किया जाता है। इसके साथ ही नृत्‍य-नाटिका के माध्यम से कन्‍हैया के जीवन से जुड़ी घटनाओं को दर्शाया जाता है।


Jyoti