Jitiya Vrat Katha : संतान की लंबी उम्र से जुड़ी हैं ये पौराणिक कथाएं, पढ़ें जीमूतवाहन और चील-सियारिन की कहानी
punjabkesari.in Saturday, Oct 03, 2026 - 09:31 AM (IST)
Jitiya Vrat Katha : सनातन धर्म में जितिया व्रत को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। जितिया व्रत को सबसे कठिन और पावन व्रतों में से एक माना जाता है। यह व्रत स माताएं अपने संतान की लंबी उम्र अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि के लिए पूरे 24 घंटे का निर्जला उपवास रखती हैं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। जितिया व्रत के दौरान मुख्य रूप से दो पौराणिक कथाएं सुनने और पढ़ने की परंपरा है- पहली चील और सियारिन की कथा, जो हमें व्रत के नियमों और निष्ठा का महत्व सिखाती है और दूसरी राजा जीमूतवाहन की कथा, जिनसे इस व्रत की शुरुआत हुई। तो आइए दोनों कथाओं के बारे में जानते हैं विस्तार से।
जितिया व्रत की कथा: चील और सियारिन की कहानी
जितिया व्रत यानी जीवित्पुत्रिका व्रत को संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाता है। इस व्रत से जुड़ी चील और सियारिन की कथा बेहद प्रसिद्ध है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक घने जंगल में एक चील और एक सियारिन रहती थीं। दोनों में गहरी दोस्ती थी। एक दिन कुछ महिलाएं जंगल से गुजरते हुए आपस में जीवित्पुत्रिका व्रत की बात कर रही थीं।उनकी बातें सुनकर चील के मन में भी यह व्रत रखने की इच्छा हुई। चील ने अपनी दोस्त सियारिन को भी व्रतद के बारे में बताया।

इसके बाद दोनों ने मिलकर पूरे विधि-विधान के साथ जितिया का व्रत रखा और पूजा की। लेकिन व्रत के दौरान दोनों को बहुत तेज भूख लगने लगी। चील ने किसी तरह अपनी भूख पर काबू रखा और व्रत पूरा करने का संकल्प निभाती रही। दूसरी ओर, सियारिन भूख सहन नहीं कर पाई। आखिरकार वह जंगल में शिकार करने चली गई और मांस खा लिया। जब चील ने उसे मांस खाते देखा तो उसने सियारिन को व्रत तोड़ने के लिए खूब समझाया और डांटा भी। इस तरह सियारिन का व्रत अधूरा रह गया, जबकि चील ने पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ व्रत पूरा किया। कहा जाता है कि अगले जन्म में दोनों का जन्म बहनों के रूप में हुआ। सियारिन का विवाह एक राजकुमार से हुआ, जबकि चील का विवाह राज्य के मंत्री के पुत्र से हुआ। कुछ समय बाद सियारिन ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन दुर्भाग्य से जन्म के कुछ ही समय बाद उसके पुत्र की मृत्यु हो गई। दूसरी ओर, चील ने भी एक पुत्र को जन्म दिया और उसका बच्चा स्वस्थ रहा।
अपने पुत्र की मृत्यु और बहन के बच्चे को स्वस्थ देखकर सियारिन के मन में ईर्ष्या पैदा होने लगी। उसने जलन में अपनी बहन के परिवार को नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी की। हालांकि, उसकी योजनाएं सफल नहीं हुईं। एक रात देवी मां ने सियारिन को स्वप्न में दर्शन दिए। उन्होंने उसे बताया कि उसके पूर्व जन्म के कर्मों का यह परिणाम है। देवी ने कहा कि यदि वह अपनी स्थिति बदलना चाहती है तो उसे सच्चे मन और पूरी श्रद्धा से जितिया व्रत करना चाहिए। सियारिन ने सुबह उठकर अपने पति को पूरा सपना बताया। पति की सलाह पर उसने अपनी बहन चील से अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगी। बहन की आंखों में पछतावा देखकर चील ने भी उसे माफ कर दिया। जब अगले वर्ष जितिया व्रत आया तो दोनों बहनों ने साथ मिलकर श्रद्धा से व्रत रखा और पूजा की। मान्यता है कि व्रत के प्रभाव और माता की कृपा से सियारिन को स्वस्थ और सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। इसके बाद दोनों बहनें अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी रहने लगीं। यह कथा बताती है कि व्रत केवल परंपरा निभाने का नाम नहीं है, बल्कि इसे श्रद्धा, संयम और सच्चे मन से करना भी जरूरी माना जाता है।

जीवित्पुत्रिका व्रत की जीमूतवाहन वाली कथा
जीवित्पुत्रिका व्रत से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण कथा राजा जीमूतवाहन की है। इस कथा में त्याग, दया और दूसरों के प्राणों की रक्षा करने का संदेश मिलता है। कथा के अनुसार, जब जीमूतवाहन के पिता वृद्ध हुए तो उन्होंने राजपाट छोड़कर वानप्रस्थ आश्रम जाने का निर्णय लिया। जीमूतवाहन को स्वयं राजा बनने में कोई विशेष रुचि नहीं थी। उन्होंने अपना राज्य अपने भाइयों को सौंप दिया और पिता की सेवा करने के लिए उनके साथ जंगल चले गए। जीमूतवाहन का विवाह मलयवती नाम की राजकन्या से हुआ था। एक दिन वह जंगल में घूम रहे थे। इसी दौरान उनकी नजर एक वृद्ध महिला पर पड़ी, जो बहुत दुखी होकर रो रही थी। जीमूतवाहन ने उसके रोने का कारण पूछा। वृद्ध महिला ने बताया कि वह नागवंश से संबंध रखती है। उसने कहा कि नागों ने पक्षियों के राजा गरुड़ को प्रसन्न करने के लिए प्रतिदिन एक नाग की बलि देने का वचन दिया है। अब उसके पुत्र शंखचूड़ की बलि देने की बारी आ गई है। बेटे की मृत्यु की बात सोचकर वह महिला फूट-फूटकर रो रही थी।
यह सुनकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने नाग माता से कहा कि वह अपने पुत्र की जगह स्वयं गरुड़ को अपनी बलि देंगे। इसके बाद उन्होंने शंखचूड़ से लाल कपड़ा लिया और उसे अपने शरीर पर लपेटकर बलि देने के लिए एक चट्टान पर लेट गए। कुछ समय बाद गरुड़ वहां पहुंचे। उन्होंने लाल कपड़े में लिपटे जीमूतवाहन को नाग समझा और अपने पंजों में उठाकर पहाड़ की ऊंचाई पर ले गए। गरुड़ के पंजों में होने के कारण जीमूतवाहन को काफी पीड़ा हुई और उनके मुंह से कराह निकलने लगी। उनकी आवाज सुनकर गरुड़ को संदेह हुआ। उन्होंने पूछा कि वह कौन हैं और नागों की जगह यहां क्यों आए हैं। तब जीमूतवाहन ने उन्हें पूरी घटना बता दी और कहा कि वह एक निर्दोष नाग के प्राण बचाने के लिए स्वयं अपनी बलि देने आए हैं।जीमूतवाहन का साहस, त्याग और दूसरों के लिए अपने प्राणों तक की परवाह न करने का भाव देखकर गरुड़ प्रसन्न हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया। साथ ही उन्होंने यह संकल्प भी लिया कि अब से वे नागों की बलि नहीं लेंगे। मान्यता है कि जीमूतवाहन के इसी त्याग और परोपकार की स्मृति में उनकी पूजा की परंपरा शुरू हुई। जीवित्पुत्रिका व्रत में इस कथा को सुनने और पढ़ने का विशेष महत्व माना जाता है। यह कथा माताओं को त्याग, प्रेम, धैर्य और संतान की रक्षा के भाव से जोड़ती है।
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