Jagadguru Adi Shankaracharya Jayanti 2026: भारतीय संस्कृति और राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने वाले थे आदि शंकराचार्य, पढ़ें कथा
punjabkesari.in Tuesday, Apr 21, 2026 - 04:27 PM (IST)
Jagadguru Adi Shankaracharya Jayanti 2026: जानिए आदि गुरु शंकराचार्य ने कैसे मात्र 32 वर्ष की आयु में वैदिक सनातन धर्म की पुनर्स्थापना की। उनके जीवन, अद्वैत दर्शन, निर्वाण षटकम् और भारत के चार कोनों में स्थापित 4 पवित्र मठों के बारे में विस्तार से पढ़ें।

Jagadguru Adi Shankaracharya Jayanti 2026: भारत में वैदिक सनातन धर्म के पुनर्जागरण के इतिहास में भगवत्पाद जगदगुरु आद्यशंकराचार्य जी का नाम सर्वोपरि है। वैदिक सनातन धर्म की पुनर्स्थापना करने वाले महान दार्शनिक आद्य शंकराचार्य जी का जन्म भारत के केरल प्रांत में वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन हुआ था।
उनके पिता का नाम शिवगुरु तथा माता का नाम आर्याम्बा था। 8 वर्ष की आयु में पूज्यपाद गोविन्द भगवत्पाद से कार्तिक शुक्ल एकादशी को संन्यास ग्रहण किया। उनका आविर्भाव ऐसी विषम परिस्थिति में हुआ, जब वैदिक सनातन धर्म पर विदेशी आक्रमण हो रहे थे।
उन्होंने अपनी विद्वता एवं तपोबल से बौद्ध विद्वानों को पराजित किया। श्री मंडन मिश्र जैसे विद्वानों को भी उन्होंने शास्त्रार्थ में पराजित कर शिष्य बनाया। उन्होंने 16 वर्ष की आयु में महान कार्यों को सम्पादित किया।
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को आदि श्रीशंकराचार्य का जन्म हुआ। सनातन संस्कृति के उत्थान और हिन्दू वैदिक सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार का श्रेय आदि गुरु शंकराचार्य को दिया जाता है। विद्वान उन्हें भगवान शिव का अवतार भी मानते हैं। वेद-शास्त्रों के ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आदि शंकराचार्य जी ने देशभर की यात्रा की और जनमानस को हिन्दू वैदिक सनातन धर्म तथा उसमें वर्णित संस्कारों के बारे में अवगत कराया।

उनके दर्शन ने सनातन संस्कृति को एक नई पहचान दी और भारत वर्ष के कोने-कोने तक उन्होंने लोगों को वेदों के अहम ज्ञान से अवगत कराया। इससे पहले यह भ्रामक प्रचार था कि वेदों का कोई प्रमाण नहीं है।
कहा जाता है कि 8 वर्ष की आयु में उन्होंने चार वेदों का ज्ञान, 12 वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों का ज्ञान तथा 16 वर्ष की आयु में उपनिषद् आदि ग्रन्थों के भाष्यों की रचना की। उन्होंने भारतवर्ष में चारों कोनों में 4 मठों की स्थापना की जो अभी तक प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं और जिन पर आसीन संन्यासी ‘शंकराचार्य’ कहे जाते हैं। ये चारों स्थान हैं- ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, श्रृंगेरी पीठ, द्वारिका शारदा पीठ और पुरी गोवर्धन पीठ।
उन्होंने अनुभव किया कि ज्ञान की अद्वैत भूमि पर जो परमात्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म है, वही द्वैत की भूमि पर सगुण साकार है। उन्होंने निर्गुण और सगुण दोनों का समर्थन करके निर्गुण तक पहुंचने के लिए सगुण की उपासना को अपरिहार्य मार्ग माना।

जहां उन्होंने अद्वैत मार्ग में निर्गुण ब्रह्म की उपासना की वहीं उन निर्गुण ब्रह्म की सगुण साकार रूप में भगवान शिव, मां पार्वती, विघ्नहर्ता गणेश, तथा भगवान विष्णु आदि के भक्तिरसपूर्ण स्तोत्रों की रचना कर उपासना की।
इस प्रकार आदि शंकराचार्य जी को सनातन धर्म को पुन:स्थापित एवं प्रतिष्ठित करने का श्रेय दिया जाता है। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि जीव की मुक्ति के लिए ज्ञान आवश्यक है।
जब आदि गुरु शन्कराचार्य जी की अपने प्रथम गुरु गोविन्द भगवत्पाद जी से भेंट हुई तो गुरु ने बालक शंकर से उनका परिचय मांगा।
बालक शंकर ने अपना परिचय किस रूप में दिया ये जानना ही एक सुखद अनुभूति बन जाता है जो ‘निर्वाण षटकम्’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
बालक शंकर बोले, ‘‘न मैं मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार और न ही स्मृति, न मैं कान हूं, न त्वचा, न नाक और न ही आंखें, न मैं अंतरिक्ष हूं, न पृथ्वी, न अग्नि, न जल और न ही पवन। मैं चेतना और आनंद का रूप हूं, मैं अनन्त शिव हूं।’’
शंकराचार्य जी का जीवनकाल सिर्फ 32 वर्ष का था। इस छोटी-सी उम्र में उन्होंने सनातन परंपराओं तथा आदि सनातन संस्कृति की व्यवस्थाओं को पुन:स्थापित कर वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना की। उनके द्वारा निर्धारित की गई व्यवस्था आज भी संतों और हिन्दू सनातन समाज का मार्गदर्शन करती है। भारतीय वैदिक सनातन संस्कृति के विकास एवं संरक्षण में उनका विशेष योगदान रहा है।
उन्होंने भारतीय संस्कृति तथा भारत राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया है।

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