दूसरों के दुख-दर्द को पहचानने वाला इंसान ही होता है श्रेष्ठ

2020-01-18T09:44:25.77

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उन दिनों आयुर्वेद के जाने-माने आचार्य नागार्जुन को अपनी प्रयोगशाला में कार्य करने के लिए एक सहायक की आवश्यकता थी। उन्होंने नौकरी के इच्छुक कई उम्मीदवारों को बुलावा भेजा और उन सबकी परीक्षा लेकर उन्होंने 2 उम्मीदवारों को ही चुना। दोनों ही उम्मीदवार बुद्धिमान और अत्यंत मेधावी प्रतीत हो रहे थे। दोनों में से किसे चुना जाए यह एक गंभीर प्रश्न था। बहुत सोच-विचार कर आचार्य ने दोनों युवकों को एक पदार्थ देकर 2 दिन का समय देते हुए घर से रसायन तैयार करके लाने के लिए कहा। 2 दिन बाद दोनों युवक आचार्य के पास पहुंचे।
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आचार्य ने उन्हें देखते ही रसायन के विषय में पूछा तो पहले युवक ने कहा, ''गुरुजी, आपके कहे अनुसार मैंने घर पर रसायन तैयार कर लिया। हालांकि घर में कई तरह की बाधाएं आईं। मेरी मां तेज ज्वर से पीडि़त थीं। पिता को भीषण पेट दर्द शुरू हो गया। संयोग कहिए कि बाहर खेलते हुए कल ही छोटे भाई के पैर की हड्डी टूट गई, फिर भी मैंने किसी बात की परवाह नहीं की। पूरी एकाग्रता से अपने काम में लगा रहा और आखिरकार यह रसायन तैयार कर ही लिया।
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पहले शिष्य की बात सुनने के बाद आचार्य ने मायूसी से सिर झुकाए दूसरे युवक की ओर देखा तो वह नम्रता से बोला, ''आचार्य जी, माफी चाहता हूं। मैं अपना काम नहीं कर सका, क्योंकि मेरे पड़ोस में रहने वाली एक वृद्ध महिला बहुत बीमार थी। उसकी सेवा करने वाला कोई नहीं था। सो मैं उसकी सेवा में लगा रहा। इतना सुनते ही आचार्य का चेहरा खिल उठा। वह उसकी पीठ थपथपाते हुए बोले, ''तुम्हीं सही उम्मीदवार हो। रसायन जीवन की रक्षा के लिए होता है और इसे वही बना सकता है जो दूसरों के दुख-दर्द पहचानने की क्षमता रखता हो। यदि उसे बनाने वाला व्यक्ति दूसरों के दुख-दर्द से विमुख हो जाए तो वह योग्य नहीं हो सकता।


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