Chandrashekhar Azad story: 14 साल की उम्र में कोड़े खाकर भी गूंजा ‘वंदे मातरम्’, अमर क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की साहसगाथा
punjabkesari.in Friday, Mar 06, 2026 - 10:04 AM (IST)
Chandrashekhar Azad biography in Hindi: क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक 8वीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे को सरेआम निर्वस्त्र किया जाए और उसके कोमल शरीर पर तब तक कोड़े बरसाए जाएं जब तक कि उसकी खाल उधड़कर जमीन पर न गिर जाए?
यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, वाराणसी के उस गुमनाम बालक की है जिसका नाम सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी। 1921, ‘असहयोग आंदोलन’ की आग पूरे देश में थी। काशी (वाराणसी) की गलियों में एक 14 वर्षीय बच्चा हाथ में तिरंगा लिए अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगा रहा था। पुलिस ने उसे पकड़ लिया और कचहरी में मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।

अंग्रेज मैजिस्ट्रेट ने रौब से पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’
बच्चे ने सीना तानकर कहा, ‘‘आजाद!’’
मैजिस्ट्रेट को गुस्सा आया, उसने फिर पूछा, ‘‘तुम्हारे बाप का नाम क्या है?’’
बच्चे की आवाज और बुलंद हुई, ‘‘स्वतंत्रता!’’
मैजिस्ट्रेट चिल्लाया, ‘‘तुम्हारा घर कहां है?’’
बच्चे ने मुस्कुराकर जवाब दिया, ‘‘जेलखाना!’’
मैजिस्ट्रेट ने 14 वर्षीय बच्चे को ऐसी खौफनाक सजा सुनाई जो इंसानियत के नाम पर कलंक थी।
उसने आदेश दिया, ‘‘इस लड़के को नंगा करके टिकटी से बांध दो और 15 बेंत (कोड़े) मारो।’’
उस बच्चे को सबके सामने निर्वस्त्र किया गया। भारी और मोटे बेंत से जब पहला प्रहार उसकी पीठ पर हुआ, तो खाल उधड़ गई और खून का फव्वारा छूट पड़ा। हर कोड़े के साथ उस बच्चे की चीख निकलती थी, लेकिन वह चीख दर्द की नहीं थी। हर कोड़े पर वह लड़का पूरी ताकत से चिल्लाता था- ‘वंदे मातरम!’’... ‘भारत माता की जय!’
हड्डियां दिखने लगीं पर आवाज नहीं रुकी। 5, 10, 12 कोड़े... उस बच्चे की पीठ का मांस फटकर लटक गया था। वह बार-बार बेहोश हो रहा था, लेकिन जैसे ही होश आता, उसके खून से लथपथ होंठों से फिर निकलता, ‘वंदे मातरम!’

मैजिस्ट्रेट खड़ा देख रहा था कि कब यह बच्चा रहम की भीख मांगेगा, कब यह रोएगा लेकिन उस बच्चे ने अपनी आंखों में इतना गर्व भर रखा था कि अंग्रेज जलकर राख हो गए। जब 15 कोड़े पूरे हुए, तो उसका शरीर मांस का एक लोथड़ा बन चुका था। जेल के डॉक्टर ने जब घावों पर दवा लगाई, तो बच्चा दर्द से तड़प उठा, लेकिन उसने एक आंसू नहीं गिराया।
बाद में इसी 14 साल के बच्चे को दुनिया ने ‘चंद्रशेखर आजाद’ के नाम से जाना। लोग उनकी मूंछों वाली फोटो तो लगाते हैं, लेकिन उस 14 साल के बच्चे की वह नंगी पीठ और बहता हुआ खून भूल गए जिसने आजादी की नींव रखी थी। आज हम अपनी छोटी-सी चोट पर रोने लगते हैं। जरा सोचिए उस बच्चे के बारे में, जिसने हमारे लिए अपनी कच्ची उम्र में कोड़े खाए थे।
उन्होंने संकल्प लिया था कि वह कभी जीवित अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे और अंतत: अपने वचन पर अडिग रहे।
क्रांतिकारी संगठन ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ को संगठित करने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। वह भगत सिंह जैसे युवा क्रांतिकारियों के प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक थे। उनका जीवन अनुशासन, साहस और संगठन-शक्ति का उदाहरण था। उन्होंने दिखाया कि देशप्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि कर्म और त्याग की मांग करता है। 27 फरवरी, 1931 को इलाहाबाद (प्रयागराज) के अल्फ्रैड पार्क में उन्होंने जिस अदम्य साहस का परिचय दिया, वह भारतीय इतिहास में अमर है। चारों ओर से पुलिस द्वारा घिर जाने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अंतत: अपने वचन की रक्षा करते हुए प्राण न्यौछावर कर दिए। मात्र 24 वर्ष की आयु में दिया गया यह बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया।
आज आवश्यकता है कि हम चंद्रशेखर आजाद के जीवन से प्रेरणा लें। देशभक्ति केवल नारों तक सीमित न रहे, बल्कि ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रहित के प्रति समर्पण के रूप में हमारे व्यवहार में दिखाई दे। यदि युवा वर्ग उनके साहस और अनुशासन को अपनाए, तो राष्ट्र निर्माण की दिशा और अधिक सुदृढ़ हो सकती है।
चंद्रशेखर आजाद का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा देशभक्त परिस्थितियों से नहीं डरता, बल्कि उन्हें बदलने का साहस रखता है। उनका बलिदान भारत की आत्मा में सदैव जीवित रहेगा।

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