Chanakya Niti : सफलता की सीढ़ी चढ़ते ही क्यों छूट जाता है अपनों का साथ ? चाणक्य के ये 5 सूत्र खोल देंगे आपकी आंखें

punjabkesari.in Sunday, Apr 05, 2026 - 02:52 PM (IST)

Chanakya Niti : कहते हैं कि सफलता शोर मचाती है, लेकिन अक्सर इस शोर के बीच कुछ ऐसी खामोशियां पनपने लगती हैं जिनकी हमने कल्पना भी नहीं की होती। जीवन का एक कड़वा सच यह है कि जैसे-जैसे व्यक्ति कामयाबी की ऊंचाइयों को छूता है, उसके आसपास का सामाजिक और पारिवारिक दायरा सिमटने लगता है। कल तक जो कंधे हमारे संघर्ष में साथ थे, वे अचानक सफलता की सीढ़ी चढ़ते ही ओझल क्यों होने लगते हैं। आचार्य चाणक्य, जिन्होंने मानवीय मनोविज्ञान और कूटनीति को सबसे गहराई से समझा, उन्होंने सदियों पहले इस 'बदलते व्यवहार' की सटीक व्याख्या कर दी थी। चाणक्य का मानना था कि ऊंचाई पर पहुंचने के बाद हवाएं सिर्फ तेज नहीं होतीं, बल्कि रिश्तों के समीकरण भी बदल देती हैं। अक्सर हम इसे अपनी गलती या दूसरों का अहंकार मान लेते हैं, लेकिन चाणक्य नीति के अनुसार इसके पीछे गहरे सामाजिक और मानसिक कारण छिपे होते हैं। तोआइए, आचार्य चाणक्य के उन सूत्रों को समझें जो आपकी आंखों से 'अपनेपन' का भ्रम हटाकर आपको वास्तविकता का दर्शन कराएंगे।

Chanakya Niti

चाणक्य के 5 कड़वे मगर सच्चे सूत्र

स्वार्थ की नींव पर टिके रिश्ते
चाणक्य कहते हैं, "बिना स्वार्थ के कोई भी मित्रता या रिश्ता नहीं होता।" जब आप सफल होते हैं, तो आपके पुराने रिश्तों की नींव की परीक्षा होती है। जो लोग केवल आपके साथ इसलिए थे क्योंकि आप उनके काम आते थे, वे आपकी सफलता के बाद दूरी बना लेते हैं क्योंकि अब आप उनकी पहुँच से बाहर या उनके लिए अनुपयोगी हो जाते हैं।

ईर्ष्या 
चाणक्य के अनुसार, मनुष्य का स्वभाव है कि वह दूसरे की तरक्की को सहन नहीं कर पाता। जब आप सीढ़ियाँ चढ़ते हैं, तो आपके अपने ही लोग गुप्त रूप से आपसे ईर्ष्या करने लगते हैं। यह जलन उन्हें आपसे दूर कर देती है, क्योंकि आपकी चमक उन्हें अपनी कमियों का एहसास कराने लगती है।

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अपेक्षाओं का भारी बोझ
सफलता के साथ लोगों की आपसे उम्मीदें बढ़ जाती हैं। लोग सोचते हैं कि अब आप सफल हो गए हैं, तो आप उनकी हर वित्तीय या सामाजिक समस्या का समाधान करेंगे। जब आप उन सभी की बेजा उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाते, तो वे आपको 'बदला हुआ' या 'अहंकारी' मानकर किनारा कर लेते हैं।

शक्ति और पद का प्रभाव
चाणक्य नीति कहती है कि जैसे ही व्यक्ति को शक्ति या पद मिलता है, उसके आसपास चापलूसों की भीड़ बढ़ जाती है। सच्चे लोग अक्सर भीड़ में पीछे छूट जाते हैं या आपकी नई जीवनशैली के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। वहीं, कुछ लोग आपके नए 'औहदे' से डरकर या संकोचवश खुद ही दूरी बना लेते हैं।

पात्रता की कमी
कई बार आपके साथ जुड़े लोग उस सफलता के स्तर को समझ ही नहीं पाते जिसे आपने हासिल किया है। वैचारिक मतभेद और जीवन को देखने का नजरिया बदलने के कारण 'फ्रीक्वेंसी' मैच नहीं होती। चाणक्य के अनुसार, जो व्यक्ति आपके संघर्ष को नहीं समझ सकता, वह आपकी सफलता में भी साथ नहीं टिक सकता।

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Content Editor

Sarita Thapa

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