Chaitra Navratri 2026 Day 5: चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन इस विधि से करें मां स्कंदमाता की पूजा और पढ़ें कथा

punjabkesari.in Sunday, Mar 22, 2026 - 02:06 PM (IST)

Chaitra Navratri 2026 Day 5: चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप की पूजा की जाती है। मां स्कंदमाता शक्ति, मातृत्व और करुणा की प्रतीक हैं। इन्हें भगवान कार्तिकेय, जिन्हें स्कंद कुमार भी कहा जाता है, उनकी माता के रूप में पूजा जाता है। इनका स्वरूप अत्यंत ही दिव्य और तेजस्वी है। माता कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं, इस नाते इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। इनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो में कमल का फूल सुशोभित है। एक भुजा अभय एवं वरद मुद्रा में उठी हुई है, जिससे वे भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती हैं, जबकि दूसरी भुजा से उन्होंने अपनी गोद में बैठे पुत्र कार्तिकेय को पकड़ा हुआ है। मां स्कंदमाता की पूजा करने से साधक को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा माना जाता है कि इनकी कृपा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इनकी उपासना से विशेष रूप से व्‍यक्‍त‍ि की ज्ञान और बुद्धि का विकास होता है, जिससे मनुष्य प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है।

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कौन हैं स्कंदमाता
भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की माता होने के कारण देवी के इस पांचवें स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार स्‍कंदमाता, मां पार्वती का ही रौद्र रूप हैं। इस संबंध में यह कथा बताई गई है कि एक बार कुमार कार्तिकेय की रक्षा के लिए जब माता पार्वती क्रोधित होकर आदिशक्ति रूप में प्रगट हुईं तो इंद्र भय से कांपने लगे। इंद्र अपने प्राण बचाने के लिए देवी से क्षमा याचना करने लगे चूंकि कुमार कार्तिकेय का एक नाम स्‍कंद भी है। सभी देवतागण मां दुर्गा के रूप को मनाने के लिए उन्‍हें स्‍कंदमाता कहकर पुकारने लगे और उनकी स्‍तुति करने लगे तभी से मां दुर्गा मां के पांचवें स्‍वरूप को स्‍कंदमाता कहा जाने लगा, और उनकी पूजा 5वीं अधिकष्‍ठात्री के रूप में होने लगी।

उपासना का फल
पौराणिक मान्यता है कि इनकी पूजा से भगवान कार्तिकेय की पूजा स्वयं ही हो जाती है और स्कंदमाता की आराधना से सूनी गोद भर जाती है। इनकी साधना से साधकों को आरोग्य, बुद्धिमता और ज्ञान की प्राप्ति होती है। इनकी उपासना से समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। भक्तों को परम शांति एवं सुख का अनुभव होने लगता है। सूर्य मण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक आलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है। संतान सुख एवं रोगमुक्ति के लिए स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए।

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स्कंदमाता के लिए भोग और मंत्र
भक्त स्कंदमाता को भोग में केले का भोग लगा सकते हैं। माता को पीला रंग पसंद है।

स्कंदमाता के रुप का महत्व
शास्त्रानुसार सिंह पर सवार स्कन्दमातृस्वरूपणी देवी की चार भुजाएं हैं, जिसमें देवी अपनी ऊपर वाली दांयी भुजा में बाल कार्तिकेय को गोद में उठाए हुए हैं और नीचे वाली दांयी भुजा में कमल पुष्प लिए हुए हैं। ऊपर वाली बाईं भुजा से इन्होंने जगत तारण वरद मुद्रा बना रखी है और नीचे वाली बाईं भुजा में कमल पुष्प है। इनका वर्णन पूर्णतः शुभ है और ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है।

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स्कंदमाता पूजा विधि
मां के श्रृंगार के लिए खूबसूरत रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। स्कंदमाता और भगवान कार्तिकेय की पूजा भक्ति-भाव और विनम्रता के साथ करनी चाहिए। पूजा में कुमकुम,अक्षत,पुष्प,फल आदि से पूजा करें। चंदन लगाएं, माता के सामने घी का दीपक जलाएं। आज के दिन भगवती दुर्गा को केले का भोग लगाना चाहिए और यह प्रसाद ब्राह्मण को दे देना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है।

बच्चों को होगा फायदा
स्कंदमाता की पूजा में पीले फूल अर्पित करें और पीली चीजों का भोग लगाएं संतान संबंधी कष्टों को दूर करने के लिए इस दिन बच्चों को फल-मिठाई बांटना भी बहुत अच्छा माना गया है।

पंचमी को लगाएं खीर और केले का भोग।

श्रीमद् देवी भागवत पुराण के अनुसार, मां की पांचवीं विश्वरूप स्कंदमाता को केले और खीर का भोग लगाना चाहिए। जिससे माता प्रसन्न होकर भक्तों द्वारा मांगी गई सभी मनोकामना को पूर्ण करती हैं। वहीं मध्य रात्रि में माता का पूजा करना विशेष फलदायी रहता है। रात्रि के वक्त विशेष अनुष्ठान करते हुए माता के नवार्ण मंत्र का जाप करना चाहिए।

इस मंत्र से करें आराधना
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

आचार्य पंडित सुधांशु तिवारी 
प्रश्न कुण्डली विशेषज्ञ/ ज्योतिषाचार्य 
9005804317

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Content Writer

Niyati Bhandari

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