Bhuvaneshwari Jayanti 2026: मां भुवनेश्वरी की पूजा से मिलता है राज-सत्ता और वैभव का वरदान, पढ़ें शुभ तिथि और धार्मिक कथा
punjabkesari.in Tuesday, Sep 22, 2026 - 02:11 PM (IST)
Bhuvaneshwari Jayanti 2026: सनातन धर्म में तंत्र और शक्ति साधना के अंतर्गत 10 महाविद्याओं की उपासना का अत्यंत विशेष महत्व माना गया है। इन 10 महाविद्याओं में चौथा स्थान प्राप्त माता भुवनेश्वरी संपूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री देवी और आद्याशक्ति हैं। भुवनेश्वरी नाम दो पवित्र शब्दों के मेल से बना है भुवन अर्थात संपूर्ण संसार या लोक और ईश्वरी अर्थात स्वामिनी या रानी।

भुवनेश्वरी जयंती 2026: शुभ तिथि और मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मां भुवनेश्वरी की जयंती श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है।
जयंती तिथि: 23 सितंबर 2026 (बुधवार)।
द्वादशी तिथि प्रारंभ: 22 सितंबर 2026 को रात 09:43 बजे से।
द्वादशी तिथि समाप्त: 23 सितंबर 2026 को रात 10:50 बजे तक।

Bhuvaneshwari Jayanti story भुवनेश्वरी जयंती कथा
धार्मिक कथा व मान्यताओं के अनुसार देवी भुवनेश्वरी, जिनको यह व्रत समर्पित है उन्हें 10 महाविद्याओं में से चौथे स्थान पर पूजा जाता है। कहा जाता है कि देवी भुवनेश्वरी तीनों लोगों की स्वामिनी हैं। प्रकृति से इनका संबंध होने के कारण इनकी तुलना मूल प्रकृति से तक की जाती है। आदिशक्ति देवी भुवनेश्वरी के स्वरूप में महादेव के समस्त लीला विलास की सहचरी कही जाती हैं, यानि इनकी सखी कहलाती हैं।
इन्हीं सभी कारणों के चलते देवी मां के इस रूप की पूजा का अधिक महत्व माना जाता है। मगर देवी भुवनेश्वरी का जन्म कैसे हुआ व उन्हें भुवनेश्वरी का दर्जा प्राप्त क्यों हुआ। इसके बारे में बहुत लोग आज भी अनजान हैं। आइए जानते हैं देवी भुवनेश्वरी के जन्म से जुड़ी पौराणिक कथा-
प्राचीन समय में जब मधु कैटभ नामक दैत्यों ने पृथ्वी और पताल पर अपना आतंक मचा कर रखा था, तब सभी देवगण भगवान विष्णु के पास जाकर संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। भगवान विष्णु ने अपनी निद्रा का त्याग कर 5000 वर्षों तक मधु कैटभ से युद्ध किया। अधिक समय तक युद्ध करने के कारण भगवान विष्णु थक गए। जिसके बाद अंत में उन्होंने अपनी अंतकरण की शक्ति योग माया आद्या शक्ति से सहायता के लिए अनुरोध किया। देवी ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह उन दोनों असुरों को अपनी माया से मोहित कर देंगी, जिसके बाद आप आसानी से उन्हें मार सकेंगे।
योग माया आद्यशक्ति की माया से मोहित होकर दोनों दैत्यों ने भगवान विष्णु से कहा था कि हमारा वध ऐसे स्थान पर कीजिएगा जहां न जल हो और न ही थल। इतना सुनते ही भगवान विष्णु ने दोनों दैत्यों को अपनी जांघ पर लेटा कर अपने सुदर्शन चक्र से उन दोनों के मस्तकों को धड़ से अलग कर दिया।
इसके उपरांत ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने देवी आदिशक्ति की स्तुति करी। जिससे प्रसन्न होकर देवी भुवनेश्वरी ने ब्रह्मा जी को सृजन, विष्णु जी को पालन और भोलेनाथ को संहार के लिए चुना।
ब्रह्मा जी ने देवी से पूछा कि चारों ओर जल ही जल व्याप्त है। न तो पंचतत्व दिखाई दे रहे हैं और न ही मात्राएं एवं इंद्रियां मौजूद हैं। ऐसी स्थिति में त्रिदेव भी शक्तिहीन क्यों हैं? ब्रह्मा जी के प्रश्न पर देवी आदिशक्ति मुस्कुराईं और उन्होंने अपने दिव्य स्वरूप की शक्ति का परिचय देने के लिए एक अद्भुत विमान प्रकट किया।
देवी ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को उस दिव्य विमान में विराजमान होने के लिए कहा। इसके बाद देवी स्वयं भी विमान के साथ आकाश मार्ग में आगे बढ़ीं। विमान वायु की गति से चलता हुआ एक ऐसे स्थान पर पहुंचा, जहां चारों ओर जल का अस्तित्व नहीं था।
वह स्थान अत्यंत मनोहारी था। वहां सुंदर उद्यान और विभिन्न प्रकार के पुष्पों से सुसज्जित वाटिकाएं थीं। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर उस दिव्य स्थान को देखकर त्रिदेव भी आश्चर्यचकित रह गए।
इसी दौरान त्रिदेव की दृष्टि एक दिव्यांगना पर पड़ी, जो एक पलंग पर विराजमान थीं। उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और अलौकिक था। उन्होंने रक्त पुष्पों की माला धारण कर रखी थी और उनके हाथों में वर, पाश तथा अंकुश जैसे दिव्य आयुध सुशोभित थे। देवी अभय मुद्रा में भी विराजमान थीं।
पौराणिक वर्णन के अनुसार, देवी भुवनेश्वरी का तेज हजारों उदित सूर्यों के समान था। उनके दिव्य स्वरूप और अलौकिक आभा को देखकर त्रिदेव विस्मित रह गए।
देवी के इस अद्भुत स्वरूप का दर्शन करने के बाद भगवान विष्णु ने उन्हें साक्षात देवी जगदंबा और महामाया के रूप में पहचाना। उन्होंने देवी की स्तुति करते हुए उन्हें संपूर्ण ब्रह्मांड की जननी माना।

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