Ahoi Ashtami 2026: संतान की लंबी उम्र के लिए 1 नवंबर को रखें अहोई अष्टमी व्रत! जानें तारों को अर्घ्य देने का सही समय और जरूरी जानकारी
punjabkesari.in Friday, Oct 30, 2026 - 02:23 PM (IST)
Ahoi Ashtami 2026: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला अहोई अष्टमी का व्रत हर मां के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और फलदायी माना गया है। करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद आने वाला यह पर्व माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में सुख-समृद्धि की मंगलकामना के लिए रखा जाता है। इस वर्ष तिथियों के फेरबदल के कारण कई महिलाओं के मन में यह सवाल है कि अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर को रखा जाएगा या 2 नवंबर को। ज्योतिष शास्त्र और पंचांग की गणना के अनुसार अहोई अष्टमी व्रत की प्रामाणिक तारीख, पूजा का शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और व्रत के कठोर नियमों की पूरी जानकारी दी जा रही है।

1 या 2 नवंबर: किस दिन रखा जाएगा अहोई अष्टमी का व्रत?
शास्त्रों के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत उसी दिन मान्य होता है, जिस दिन शाम (प्रदोष काल) के समय अष्टमी तिथि विद्यमान रहे और तारों के दर्शन व पूजन का योग बने।
हिंदू पंचांग की गणना के अनुसार:
अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 1 नवंबर 2026 (रविवार) को दोपहर 02:51 बजे।
अष्टमी तिथि का समापन: 2 नवंबर 2026 (सोमवार) को दोपहर 01:10 बजे।
क्योंकि 2 नवंबर की शाम को नवमी तिथि लग जाएगी और उस समय अष्टमी तिथि मौजूद नहीं रहेगी, इसलिए शास्त्र सम्मत विधान के अनुसार 1 नवंबर की शाम को ही तारों को अर्घ्य देकर व्रत संपन्न करना उचित है। अतः इस वर्ष अहोई अष्टमी का व्रत रविवार, 1 नवंबर 2026 को ही रखा जाएगा।

अहोई अष्टमी 2026: शुभ मुहूर्त एवं समय सारणी
पूजा-पाठ और तारों के दर्शन के लिए पंचांग अनुसार
अहोई माता पूजा मुहूर्त- शाम 05:36 बजे से शाम 06:54 बजे तक (अवधि: 1 घंटा 18 मिनट)
तारों के दर्शन का समय- शाम 05:22 बजे से (आसमान साफ रहने पर)
चंद्रोदय का समय- रात 11:40 बजे
अष्टमी तिथि प्रारंभ- 1 नवंबर 2026, दोपहर 02:51 बजे
अष्टमी तिथि समापन- 2 नवंबर 2026, दोपहर 01:10 बजे

अहोई अष्टमी पूजा विधि
अहोई पूजन के लिए शाम के समय घर की उत्तर दिशा की दीवार पर गेरू से आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास सेह तथा उसके बच्चों की आकृतियां बनाई जाती हैं। कई समृद्ध परिवार इस दिन चांदी की अहोई बनवकार पूजन भी करते हैं। चांदी की अहोई में दो मोती डालकर विशेष पूजा भी की जाती है। इसके लिए एक धागे में अहोई व दोनों चांदी के दानें डाले जाते हैंं। हर साल इसमें दाने जोड़े जाने की मान्यता प्रचलित है। घर की उत्तर दिशा अथवा ब्रह्म केंद्र में ज़मीन पर गाय के गोबर और चिकनी मिट्टी से लीपकर कलश स्थापना की जाती है। पूजन के समय कलश स्थापना कर प्रथम पूज्य गणेश की पूजा की जाती है उसके बाद अहोई माता की पूजा करके उनका षोडशोपचार पूजन किया जाता है तथा उन्हें दूध, शक्कर और चावल का भोग लगाया जाता है। इसके बाद एक लकड़ी के पाटे पर जल से भरा लोटा स्थापित करके अहोई की कथा सुनी और कही जाती है।
अहोई अष्टमी पूजा मंत्र: ॐ उमादेव्यै नमः॥
सूर्यास्त के पश्चात तारों के निकलने पर महादेवी व उनके सात पुत्रों का विधान से पूजन किया जाता है। पूजा के बाद बुजुर्गों के पैर छूकर आर्शीवाद लेते हैं। इसके बाद करवा से तारों पर जल का अर्घ्य देकर उनका पूजन किया जाता है।
तारों के निकलने पर महादेवी का षोडशोपचार पूजन करें। गौघृत में हल्दी मिलाकर दीपक करें, चंदन की धूप करें। देवी पर रोली, हल्दी व केसर चढ़ाएं। चावल की खीर का भोग लगाएं। पूजन के बाद भोग किसी गरीब कन्या को दान दे दें। जीवन से विपदाएं दूर करने के लिए महादेवी पर पीले कनेर के फूल चढ़ाएं। अपनी संतान की तरक्की के लिए देवी अहोई पर हलवा पूड़ी चढ़ाकर गरीब बच्चों में बाटें दें। संतानहीनता के निदान के लिए कुष्मांड पेट से 5 बार वारकर मां पार्वती पर चढ़ाएं।
अहोई अष्टमी के दिन न करें ये गलतियां
मिट्टी की खुदाई से बचें।
धारदार व नुकीली वस्तुओं का त्याग करें।
काले और नीले कपड़े न पहनें।
तांबे के लोटे से अर्घ्य न दें।
दिन में सोने से बचें।
क्रोध और क्लेश से दूरी बनाकर रखें।

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