80वां स्वतंत्रता दिवस: क्या हम वाकई स्वतंत्र हैं या केवल भ्रम में जी रहे हैं? आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर से जानिए वास्तविक मुक्ति का मार्ग

punjabkesari.in Saturday, Aug 15, 2026 - 10:35 AM (IST)

80th Independence Day: हर व्यक्ति स्वतंत्र होना चाहता है, किंतु इस संसार में हम सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। यहां कोई भी पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है। बाल्यावस्था में हमारा जीवन दूसरों पर निर्भर होता है, हमें भोजन कराने से लेकर हमारी देखभाल करने तक। युवावस्था में भी किसी न किसी रूप में हमें दूसरों का सहारा लेना पड़ता है। वृद्धावस्था तो हमें निर्भरता का अनुभव और भी स्पष्ट रूप से कराती है। यहां तक कि मृत्यु के पश्चात भी अंतिम संस्कार के लिए हम किसी और पर निर्भर होते हैं।

जिसे हम स्वतंत्रता समझ बैठते हैं, वह कई बार केवल एक भ्रम होती है। कुछ कागज़ के नोट हमारे हाथ में आते हैं और हमें लगता है कि हम स्वतंत्र हैं, हम धन देकर अपनी आवश्यकताएं पूरी कर सकते हैं। किंतु कल्पना कीजिए, यदि एक दिन संसार की सारी मुद्राएं अचानक मूल्यहीन घोषित कर दी जाएं, तो क्या होगा? आपके पास लाखों-करोड़ों रुपये हों, परंतु वे किसी वस्तु को खरीद न सकें, तब क्या करेंगे? तब हमें अनुभव होगा कि जिस स्वतंत्रता पर हमें इतना गर्व था, वह वास्तव में एक मिथ्या धारणा थी। हम वायु पर निर्भर हैं, वृक्षों पर निर्भर हैं। वही वृक्ष हमें प्राणवायु देते हैं और हमारे जीवन को बनाए रखते हैं। हम इस पृथ्वी पर निर्भर हैं और यह पृथ्वी भी अनगिनत रूपों में हम पर निर्भर है। अस्तित्व का स्वरूप ही परस्पर निर्भरता का है।

वास्तविक स्वतंत्रता तब जन्म लेती है, जब हमें यह बोध होता है कि हमारा वास्तविक आश्रय हमारे भीतर विद्यमान उस अंतःस्थ चेतना में है। जब हम अपनी ही भावनाओं की जकड़न से मुक्त हो जाते हैं, अपने ही विचारों, धारणाओं और पूर्वाग्रहों के बंधनों से ऊपर उठ जाते हैं, तभी हम स्वयं को वास्तव में स्वतंत्र कह सकते हैं।

स्वतंत्रता हमारे भीतर निर्भयता लाती है। स्वतंत्रता का अर्थ है, प्रसन्नता, आत्मविश्वास और सहजता। जब तक हम संकीर्ण मानसिकता, संकुचित विचारधारा और सीमित दृष्टिकोण से मुक्त नहीं होते तथा जीवन को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना नहीं सीखते, तब तक हमारी स्वतंत्रता अधूरी है। जब मन किसी दबाव, भय या चिंता से मुक्त होकर सोच सके। जब हम नशे और विनाशकारी आदतों के बंधन से मुक्त हों, तभी हम स्वतंत्रता की सच्ची भावना का उत्सव मना रहे होते हैं।

राष्ट्र की स्वतंत्रता और व्यक्ति की स्वतंत्रता एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। यदि व्यक्ति का मन भय, घृणा और संकीर्णता से बंधा हुआ है, तो बाहरी स्वतंत्रता भी पूर्ण नहीं हो सकती और जब व्यक्ति भीतर से स्वतंत्र होता है, तब उसमें वह विवेक, करुणा और उत्तरदायित्व जागता है, जिसके द्वारा वह राष्ट्र की स्वतंत्रता का उपयोग समस्त समाज और समूची मानवता के कल्याण के लिए कर सकता है।

हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारा देश लंबे समय तक औपनिवेशिक दासता की जंजीरों में जकड़ा रहा और असंख्य बलिदानों के पश्चात् स्वतंत्र हुआ। हमारे पूर्वजों ने स्वतंत्र भारत के निर्माण के लिए अपार त्याग और तपस्या की। उन्होंने स्वतंत्रता इसलिए चाही थी कि देश का प्रत्येक नागरिक समृद्धि, सम्मान और सुख के साथ जीवन जी सके क्योंकि पराधीनता का अर्थ था पीड़ा, शोषण और दासत्व।

आज जब हम उस पराधीनता से मुक्त हैं, तो हमारा दायित्व है कि हम एक-दूसरे की चिंता करें, एक-दूसरे का हाथ थामें। यही परस्पर अपनत्व जीवन में प्रसन्नता और संतोष का संचार करता है।

हर व्यक्ति सुखी होना चाहता है। किंतु जब तक हम अपनी जीवन-ऊर्जा को किसी उच्च उद्देश्य की ओर प्रवाहित नहीं करते, तब तक सच्चे और स्थायी आनंद की प्राप्ति लगभग असंभव है।

इस वर्ष जब हम भारत का 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तब यह स्मरण करना भी आवश्यक है कि भारत का प्रत्येक प्रांत अपनी विशिष्ट संस्कृति और पहचान से समृद्ध है। हर प्रदेश का अपना भोजन, अपनी भाषा, अपना संगीत और अपनी जीवन-शैली है। इस विविधता का सम्मान और उत्सव मनाया जाना चाहिए। मैं बच्चों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करना चाहता हूं कि वे अपनी मातृभाषा अवश्य सीखें और जितनी अधिक भाषाएं सीख सकें, उतना ही अच्छा है। अनेक भाषाएं हमें केवल शब्द नहीं देतीं, वे हमें अनेक संस्कृतियों, भावनाओं और दृष्टिकोणों से जोड़ती हैं।

यह वह अवसर है जब पूरा देश एक साथ खड़ा होकर उन महान पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करे, जिन्होंने हमें उत्पीड़न और पराधीनता से मुक्त कराने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। आज हमारे देश में युवाओं की विशाल शक्ति है। भारत विश्व के सबसे युवा देशों में से एक है। हमारे पास सपने भी हैं, संभावनाएं भी हैं और भविष्य के प्रति आशा भी।

आइए, हम अपने राष्ट्र के प्रति पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ आगे बढ़ें। हमारा संकल्प केवल भारत में शांति और समृद्धि स्थापित करने तक सीमित न रहे, बल्कि संपूर्ण विश्व में शांति, सौहार्द और समृद्धि के लिए हो।

बाहरी स्वतंत्रता हमें एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाती है
लेकिन भीतर की स्वतंत्रता ही हमें वास्तव में स्वतंत्र मनुष्य बनाती है। आइए, भय से मुक्त हों, संकीर्णताओं से ऊपर उठें, अपने भीतर की चेतना से जुड़ें और ऐसी स्वतंत्रता का अनुभव करें जो केवल अधिकार नहीं, बल्कि विवेक, उत्तरदायित्व, करुणा और समस्त मानवता के कल्याण का संकल्प भी हो। यही वास्तविक स्वतंत्रता है।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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