दुबई में तृतीय अंतरराष्ट्रीय आयुष सम्मेलन 2026 में डॉ. विकास सिंघल ने कीलोइड उपचार पर प्रस्तुत किया शोध, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना
punjabkesari.in Friday, Feb 27, 2026 - 09:30 AM (IST)
नेशनल डेस्क। दुबई में आयोजित तृतीय अंतरराष्ट्रीय आयुष सम्मेलन 2026 में डॉ. विकास सिंघल की प्रस्तुति ने न केवल शैक्षणिक जगत का ध्यान आकर्षित किया बल्कि आयुष पद्धतियों के प्रति वैश्विक जिज्ञासा और विश्वास को भी सुदृढ़ किया। यह सम्मेलन विभिन्न महाद्वीपों से आए चिकित्सा विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों का संगम रहा जहां समन्वित स्वास्थ्य प्रणाली (Integrative Medicine) पर गहन विचार-विमर्श हुआ।
अपने शोध-पत्र में डॉ. सिंघल ने कीलोइड की रोगजनन प्रक्रिया (Pathogenesis) को सरल और वैज्ञानिक ढंग से समझाया। उन्होंने बताया कि जब त्वचा पर गहरा घाव होता है तो शरीर की स्वाभाविक उपचार प्रणाली सक्रिय होकर कोलेजन का निर्माण करती है। किन्तु कुछ व्यक्तियों में यह प्रक्रिया असंतुलित हो जाती है जिसके कारण घाव भरने के बाद भी ऊतक का अत्यधिक विकास होता रहता है और उभरा हुआ कठोर तथा कभी-कभी दर्दयुक्त दाग बन जाता है जिसे कीलोइड कहा जाता है। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसके उपचार के लिए स्टेरॉयड इंजेक्शन, सर्जरी या लेज़र थेरेपी जैसे विकल्प अपनाए जाते हैं परंतु पुनरावृत्ति की संभावना बनी रहती है।
इसी संदर्भ में डॉ. सिंघल ने अपने केस स्टडी के माध्यम से यह दर्शाया कि होम्योपैथी में रोगी के संपूर्ण व्यक्तित्व—उसकी शारीरिक संरचना, मानसिक प्रवृत्ति, पारिवारिक इतिहास तथा रोग के विकासक्रम—का समग्र विश्लेषण कर औषधि का चयन किया जाता है। उन्होंने बताया कि संबंधित बाल रोगी में न केवल त्वचा संबंधी लक्षणों का अध्ययन किया गया, बल्कि उसके स्वभाव, नींद, भूख, भय, संवेदनशीलता आदि पहलुओं को भी ध्यान में रखा गया। उपचार की अवधि के दौरान क्रमिक सुधार दर्ज किया गया—पहले सूजन और कठोरता में कमी, फिर त्वचा के रंग और बनावट में परिवर्तन, तथा अंततः दाग का समतल होना।
उन्होंने उपचार प्रक्रिया के दस्तावेजीकरण, फोटो रिकॉर्ड, फॉलो-अप चार्ट और नैदानिक अवलोकनों का प्रस्तुतीकरण किया जिससे शोध की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ी। उपस्थित विशेषज्ञों ने प्रश्नोत्तर सत्र में उपचार की कार्यप्रणाली, औषधि चयन के मानदंड तथा दीर्घकालिक परिणामों के बारे में विस्तार से चर्चा की। कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने भविष्य में संयुक्त शोध और क्लिनिकल ऑब्ज़र्वेशन कार्यक्रमों में सहयोग की इच्छा भी व्यक्त की।
यह सम्मेलन, जो पूर्व में Sheikh Mohammed bin Rashid Al Maktoum के संरक्षण में आयोजित होता रहा है वैश्विक स्वास्थ्य नीति और पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। ऐसे मंच पर भारतीय चिकित्सक द्वारा प्रस्तुत यह शोध आयुष पद्धति की वैज्ञानिक संभावनाओं को उजागर करने वाला महत्वपूर्ण उदाहरण माना गया।
वर्ष 2004 से चिकित्सा सेवा में संलग्न डॉ. विकास सिंघल ने अपने संबोधन में कहा कि “आयुष प्रणाली का उद्देश्य केवल रोग का दमन नहीं बल्कि शरीर की अंतर्निहित उपचार क्षमता को जाग्रत करना है।” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि होम्योपैथी में उपचार दीर्घकालिक और स्थायी परिणाम देने के लिए रोग के मूल कारण तक पहुँचने का प्रयास करता है।
उनकी संस्था में दीर्घकालिक, पुनरावर्ती और जटिल रोगों—जैसे त्वचा रोग, एलर्जी, ऑटोइम्यून विकार और हार्मोनल असंतुलन—पर अनुसंधान-आधारित उपचार किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके रोगियों का अनुभव और संतुष्टि भारतीय होम्योपैथिक चिकित्सा की बढ़ती प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
दुबई में प्रस्तुत यह शोध इस बात का संकेत है कि जब पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक पद्धति और व्यवस्थित दस्तावेजीकरण के साथ प्रस्तुत किया जाता है तो वह वैश्विक मंच पर सम्मान और स्वीकार्यता प्राप्त करता है। समन्वित स्वास्थ्य देखभाल की ओर बढ़ती विश्व प्रवृत्ति के बीच भारतीय आयुष प्रणाली की ऐसी उपलब्धियाँ भविष्य में और व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं।
