माइनिंग सेक्टर के लिए गेमचेंजर बनेगा बजट 2026, मेटल्स पर बड़ा ऐलान संभव!
punjabkesari.in Wednesday, Jan 14, 2026 - 06:02 PM (IST)
बिजनेस डेस्कः बजट 2026 माइनिंग सेक्टर के लिए गेमचेंजर बन सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार यूनियन बजट 2026-27 में एक औपचारिक माइनिंग पॉलिसी लाने की तैयारी में है। इस नीति का मकसद आयात पर निर्भरता घटाकर देश में चांदी, कॉपर और जिंक के उत्पादन को तेजी से बढ़ाना है। नीति से जुड़े सूत्रों के अनुसार यह पहल पिछले साल किए गए माइनिंग सुधारों को आगे बढ़ाएगी और घरेलू खनिज संसाधनों के बेहतर उपयोग पर फोकस करेगी।
ग्लोबल सप्लाई चेन दबाव में, घरेलू उत्पादन पर जोर
प्रस्तावित नीति में प्राइवेट कंपनियों की भूमिका को और मजबूत किया जा सकता है, ताकि बढ़ती औद्योगिक मांग को पूरा किया जा सके। खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बना हुआ है। सूत्रों के मुताबिक सरकार का फोकस चांदी, कॉपर और जिंक जैसे अहम मेटल्स पर है, क्योंकि इनकी जरूरत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तेजी से बढ़ रही है और भारत के पास इनका सीमित लेकिन उपयोगी संसाधन आधार मौजूद है।
आयात पर निर्भरता घटाने की तैयारी
नीति में चांदी की रिकवरी और रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया जाएगा। भारत दुनिया के सबसे बड़े चांदी उपभोक्ताओं में शामिल है, लेकिन अभी भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है, खासकर चीन से। हाल ही में चीन द्वारा कुछ मेटल्स के निर्यात पर पाबंदी लगाए जाने के बाद सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने को लेकर ज्यादा गंभीर नजर आ रही है। अधिकारियों का मानना है कि मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए अहम मेटल्स में आत्मनिर्भरता जरूरी है।
EV, सोलर और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को मिलेगा फायदा
सरकार चांदी, कॉपर और जिंक को प्राथमिकता इसलिए दे रही है क्योंकि इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन, पावर और कंस्ट्रक्शन जैसे सेक्टर्स में तेजी से बढ़ रहा है। अधिकारियों के अनुसार जिंक के मामले में भारत पहले से मजबूत स्थिति में है और इसमें क्षमता विस्तार की काफी गुंजाइश है। वहीं कॉपर माइनिंग को भी खोलने की योजना है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा अभी आयात करता है।
रेयर अर्थ मेटल्स पर भी नजर
लंबी अवधि की रणनीति के तहत सरकार रेयर अर्थ मेटल्स पर भी काम शुरू करने की तैयारी कर रही है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि इसके लिए विस्तृत सर्वे, भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण मंजूरी जैसी चुनौतियां हैं और उत्पादन शुरू होने में 5–6 साल लग सकते हैं। बावजूद इसके सरकार मानती है कि इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, ड्रोन, फाइटर जेट, इलेक्ट्रिक वाहन मोटर और पवन टर्बाइन जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनने के लिए रेयर अर्थ मेटल्स का घरेलू आधार बेहद जरूरी है।
