Budget Expectations: बजट में बड़ा ऐलान संभव! विदेशी कंपनियों के टैक्स नियम बदलेंगे?
punjabkesari.in Wednesday, Jan 07, 2026 - 11:13 AM (IST)
बिजनेस डेस्कः पिछले एक दशक में भारतीय बाजार ने वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत पहचान बनाई है। आज भारत लगभग हर सेक्टर में विदेशी निवेश के लिए खुला है, वहीं भारतीय कंपनियां भी आत्मविश्वास के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार कर रही हैं। भारतीय शेयर और सरकारी बॉन्ड अब बड़े ग्लोबल इंडेक्स का हिस्सा बन चुके हैं और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में रुपए के इस्तेमाल में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। यह बदलाव सरकार द्वारा FEMA, FDI और SEBI के नियमों में किए गए सुधारों का नतीजा है।
हालांकि, इतनी प्रगति के बावजूद इनकम टैक्स कानूनों में कुछ जटिलताएं अब भी बनी हुई हैं, जो विदेशी निवेशकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए चिंता का कारण बनती हैं। ऐसे में सबकी नजरें अब बजट 2026 पर टिकी हैं कि क्या सरकार इन टैक्स विसंगतियों को दूर करेगी।
शेयरहोल्डर्स पर टैक्स का पेंच
अक्सर किसी भारतीय कंपनी का स्वामित्व किसी विदेशी कंपनी के पास होता है। ग्लोबल स्तर पर मर्जर और रीस्ट्रक्चरिंग एक सामान्य प्रक्रिया है। यदि किसी विदेशी कंपनी का दूसरी विदेशी कंपनी में विलय होता है, तो तकनीकी रूप से उस भारतीय कंपनी के शेयर भी नए मालिक के पास चले जाते हैं।
भारतीय टैक्स कानून यहीं एक विरोधाभासी स्थिति पैदा करता है। नियमों के तहत कंपनियों के स्तर पर इस तरह के ट्रांसफर को टैक्स छूट मिल सकती है लेकिन जब उसी लेनदेन में शेयरहोल्डर्स की भूमिका आती है, तो उनके लिए कोई स्पष्ट टैक्स राहत नहीं है यानी जिस ट्रांजेक्शन को सरकार कंपनी के स्तर पर टैक्स-फ्री मानती है, उसी पर शेयरहोल्डर्स को टैक्स चुकाने की नौबत आ सकती है।
भारतीय मल्टीनेशनल कंपनियों की दिक्कत
समस्या सिर्फ विदेशी कंपनियों तक सीमित नहीं है। कई भारतीय कंपनियां अब वैश्विक स्तर पर काम कर रही हैं और उनकी विदेशों में कई सहायक इकाइयां हैं। यदि कोई भारतीय कंपनी अपनी दो विदेशी सब्सिडियरी का मर्जर करना चाहती है, तो मौजूदा टैक्स नियम उसके लिए मुश्किल खड़ी कर देते हैं।
वर्तमान कानूनों के अनुसार, इस तरह के ओवरसीज रीस्ट्रक्चरिंग पर भारतीय कंपनी को कैपिटल गेन्स टैक्स देना पड़ सकता है। टैक्स न्यूट्रलिटी का अभाव कंपनियों को अपने वैश्विक कारोबार के पुनर्गठन से रोकता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे आंतरिक बदलावों को आमतौर पर टैक्स से मुक्त रखा जाता है।
ग्लोबल बिजनेस हब बनने की चुनौती
भारत खुद को पूंजी, नवाचार और कॉरपोरेट मुख्यालयों के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है। इसके लिए जरूरी है कि टैक्स सिस्टम भी अंतरराष्ट्रीय कारोबारी जरूरतों के अनुरूप हो। यदि बजट 2026 में सरकार ओवरसीज रीस्ट्रक्चरिंग से जुड़े टैक्स नियमों को स्पष्ट और सरल बनाती है, तो इससे न केवल भ्रम कम होगा बल्कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
टैक्स विशेषज्ञों का मानना है कि डी-मर्जर, हाइव-ऑफ जैसी प्रक्रियाओं को भी टैक्स छूट के दायरे में लाया जाना चाहिए। इससे अनजाने में बनने वाली टैक्स देनदारियां खत्म होंगी और भारत को वैश्विक कॉरपोरेट रीस्ट्रक्चरिंग के लिए एक आकर्षक गंतव्य बनाने में मदद मिलेगी।
