‘सबसे बड़े समझौते से क्यों अलग हो गया भारत’

2020-11-24T04:04:49.563

आर. सी.ई.पी. यानी रिजनल कंप्रीहैंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप ...इसका आजकल बहुत जिक्र हो रहा है। हिंदी में अनुवाद करें तो क्षेत्रीय व्यापार आर्थिक सांझेदारी। दरअसल यह दुनिया का व्यापार के क्षेत्र में सबसे बड़ा समझौता है। चीन समेत 15 देशों के बीच यह हुआ है जिनकी कुल आबादी 2 अरब 20 करोड़ से ज्यादा है। दुनिया की जी.डी.पी. में इनका योगदान तीस फीसदी है। कुल 25 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था जो अमरीका से कुछ ही ज्यादा है। लेकिन इसमें भारत शामिल नहीं है। वह भारत शामिल नहीं है जिसकी पहल पर 2013 में इस पर बात शुरू हुई थी। 

पिछले साल नवंबर में भारत ने साफ कर दिया था कि वह इससे अलग ही रहेगा। भारत ने तब कुछ ऐतराज सामने रखे थे जिस पर कोई बीच का रास्ता नहीं निकल सका था। आखिर सवाल उठता है कि आज के भू-मंडलीकरण के युग में इतने बड़े बाजार से भारत वंचित कैसे रह सकता है। भारत को आर.सी.ई.पी. से बाहर रहने में कितना घाटा होगा या लाभ होगा और भारत के पास क्या कोई आगे विकल्प बचे हैं। 

इस पर बात करेंगे आर.सी.ई.पी. में चीन, आसियान देशों के ब्लाक के दस देशों के अलावा आस्ट्रेलिया, वियतनाम, जापान, न्यूजीलैंड और द. कोरिया शामिल हैं। हैरानी की बात है कि जो देश कोरोना के मामले में चीन से नाराज हैं, जिन देशों के साथ चीन का सीमा विवाद चल रहा है , जिन देशों के साथ दक्षिण चीन सागर पर आधिपत्य की लड़ाई चल रही है वे सब देश चीन के साथ इस समझौते में शामिल हैं। 

हैरानी की बात है कि ये सभी देश चीन को विस्तारवादी देश मानते हैं। जानते हैं कि चीन अपनी आक्रामक विदेश नीति और आर्थिक नीति का विस्तार आर.सी.ई.पी. के माध्यम से बिना चवन्नी खर्च किए करेगा फिर भी हिस्सेदारी कर रहे हैं। लेकिन भारत अलग है। जानकारों का कहना है कि भारत की नई आर्थिक नीति साफ है कि ऐसा कुछ मत करो जिससे चीन को अपना सामान भारत में बेचने का मौका मिले। ऐसे किसी कागज पर हस्ताक्षर नहीं करो जिससे भले ही हमारा भला हो लेकिन चीन का हमसे ज्यादा भला हो। लेकिन सवाल उठता है कि क्या भारत की नई नीति ठीक है ... क्या आज की ग्लोबल दुनिया के दौर में अपने दरवाजे बंद करके बैठा जा सकता है। 

क्या भारतीय कारखानों को संरक्षणवाद चाहिए या आगे बढऩे के मौके, दुनिया के दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा करने की चुनौती, भारत सरकार से कुछ ऐसी रियायतें जिससे कारखाने मजबूत हो सकें, दुनिया के दूसरे देशों का मुकाबला कर सके। जानकारों का कहना है कि वोकल फॉर लोकल या आत्मनिर्भर भारत से काम नहीं चलने वाला है। भारत ने आर.सी.ई.पी. में शामिल नहीं हो कर बहुत बड़ा मौका गंवा दिया है। क्या सचमुच में ऐसा है या भारत ने राष्ट्रीय हितों को आगे रखा है। चीन के आगे घुटने टेकने से इन्कार किया है। चीन को ठेंगा दिखाने की हिम्मत दिखाई है। 

आर.सी.ई.पी. में जो 15 देश शामिल हैं वह आपस में बिना किसी रोक-टोक  के व्यापार कर सकेंगे। आसान शब्दों में कहा जाए कि जैसे दिल्ली और नोएडा के बीच, जैसे दिल्ली और गुरुग्राम के बीच आप अपना सामान लेकर जा सकते हैं, उसे बेच कर वापस आ सकते हैं, वहां से सामान लाकर दिल्ली में बेच सकते हैं ठीक वैसा ही अब इन 15 देशों के बीच होगा। एक तरह से कहें तो यह 15 देश भारत के 15 राज्य हो गए हैं जहां आपस में व्यापार आसानी से किया जा सकता है। 

आयात या निर्यात पर टैक्स 90 फीसदी कम हो जाएगा यानी मौटे तौर पर दस फीसदी टैक्स ही लगेगा। अब सवाल उठता है कि इतना अच्छा मौका भारत क्यों चूक बैठा। भारत शामिल हो जाता तो भारत के 138 करोड़ लोगों को न्यूजीलैंड से सस्ता दूध, पनीर, अंडे  मिलते, आस्ट्रेलिया से सस्ता गेहूं मिलता, वियतनाम से सस्ता चावल मिलता, चीन से सस्ता स्टील, कपास आदि जिंस मिलते लेकिन भारत का कहना है कि इससे भारत के किसान बर्बाद हो जाते, डेयरी उद्योग में काम करने वाले सड़क पर आ जाते। इसी तरह सर्विस सैक्टर पर भी इसका बुरा असर पड़ता। 

इसके अलावा समझौते में शामिल देश किसी देश को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा नहीं दे सकते थे। भारत ऐसा नहीं चाहता था। आखिर पाकिस्तान से लाख तनातनी के बाद भी भारत ने पाकिस्तान को यह दर्जा दे रखा है। कुछ अन्य पड़ोसी देशों को भी सामरिक रणनीति के तहत दर्जा दे रखा है। इससे भारत चीन की किलेबंदी को कुछ हद तक रोकने में कामयाब हुआ है। अगर भारत समझौते में शामिल हो जाता तो चीन को भारत के पड़ोसी देशों के साथ खुलकर खेलने का मौका मिल जाता। पूरी दुनिया जानती है कि कैसे चीन पहले कर्जा देता है फिर जमीन हड़पता है, खानें हड़पता है और कैसे उस देश को अपना आॢथक गुलाम बना लेता है। एक साल से भारत चीन से उलझा हुआ है। ताजा मामला गलवान घाटी का है। अरुणाचल प्रदेश में चीन दखल देता रहता है, भूटान पर दबाव डालता रहता है, नेपाल तक रेलवे लाइन बिछाने की बात कर रहा है, ऐसे में भारत चीन को यह मौका कैसे दे सकता था।

भारत समझौते में आटो ट्रिगर मैकेनिज्म चाहता था। आसान शब्दों में कहा जाए तो भारत चाहता था कि चीन जैसे देश कितनी भी मात्रा में अपना सामान डंप नहीं कर सकें। तो भारत का सुझाव था कि मान लिया जाए कि भारत चीन से एक लाख मोबाइल आयात करता है तो उसमें दस या बीस या तीस हजार (यह सिर्फ एक उदाहरण है) दस प्रतिशत टैक्स के साथ आएं लेकिन बाकी बचे मोबाइल पर टैक्स की दरें भारत तय करे। लेकिन चीन ने इसे मानने से इंकार कर दिया। 

इस पर भारत ने कहा कि कोई भी देश केवल वही उत्पाद बेचेगा जो उसके यहां ही निर्मित किया गया हो। यहां भारत को शक था कि चीन जैसे देश कुछ अपना माल बेच देंगे और आर्डर पूरा करने के लिए कुछ सामान हांगकांग से खरीदकर उसे चीन में बना बताकर बेच देंगे। यह धोखाधड़ी चीन पहले से करता आ रहा है। भारत इस पर रोक लगाना चाहता था लेकिन चीन अड़ गया तो भारत अलग हो गया।-विजय विद्रोही
 


Pardeep

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