विस्तारवाद और दक्षिण पूर्वी तथा मध्य एशिया में भारत की भूमिका
punjabkesari.in Saturday, Jan 10, 2026 - 05:31 AM (IST)
बड़े देश अपने से छोटे लेकिन प्राकृतिक संपदा से युक्त देशों पर हमेशा से कब्जा करते रहे हैं, ठीक वैसे ही, जैसे जंगल में बड़े और शक्तिशाली जानवर कमजोर लेकिन पौष्टिक खुराक होने के कारण छोटे जानवरों को अपना भोजन बनाते हैं।
सच का सामना : जहां एक ओर भारत किसी अन्य देश पर आॢथक या सैन्य हमला कर उसे अपने अधीन करने का विरोधी रहा है, दूसरी ओर अपने देश के नागरिक नगरों, महानगरों, कस्बों और यहां तक कि देहाती क्षेत्रों में जब भी मौका मिले, किसी जमीन पर कब्जा करने की सोच रखते हैं, विशेषरूप से जो सरकारी है। यह परंपरा स्वतंत्र होने और इतने वर्ष बाद भी देश के सभी प्रदेशों में अतिक्रमण के नाम से जानी जाती है। हाल ही का उदाहरण है। दिल्ली के तुर्कमान गेट पर गैर कानूनी तरीके से कब्जाई सरकारी भूमि पर बनी इमारतों को हटाने के लिए कार्रवाई हुई तो स्थानीय लोगों ने अपने राजनीतिक आकाओं के उकसाने पर पत्थरबाजी कर न केवल बाधा डाली, बल्कि बड़े-बड़े वकील सुप्रीम कोर्ट तक में इसके खिलाफ याचिका दायर करने की मंशा जाहिर करने लगे।
गौर करने की बात है कि यह अतिक्रमण एक दिन में नहीं हुआ। इन सब अवैध बिल्डिंगों को बनने में समय लगा होगा, परंतु क्योंकि यह सब बहुत सुनियोजित सांठ-गांठ के साथ हुआ, इसलिए पुलिस और प्रशासन इस दौरान आंख मूंद कर बैठे रहे। जब कुछ लोगों ने भरपूर धन दौलत या काली कमाई जमा कर ली और इन जगहों पर लोगों का चलना-फिरना और रहना मुश्किल होने लगा तो तुरंत कार्रवाई कर बुलडोजर चल गए। अब जो हंगामे के हालात बने, वे एक बड़े पैमाने पर दंगे भड़कने की तैयारी में बदलने लगे। यही प्रक्रिया कमोबेश हर जगह दोहराई जाती है। अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े देश जैसे कि अमरीका का वेनेजुएला पर कब्जा। छोटे देश, जो शक्तिशाली नहीं लेकिन अपनी प्राकृतिक संपदा, जैसे तेल और खनिज भंडार के कारण बड़े देशों को उन पर अधिकार करने की दावत देते रहते हैं, वे या तो स्वयं समर्पण कर देते हैं या फिर थोड़े-बहुत विरोध के बाद बड़े देश का आधिपत्य स्वीकार कर लेते हैं। अन्य उदाहरणों में रूस की यूक्रेन, चीन का ताइवान जैसे पड़ोसियों को हड़पने की कोशिश। इन बड़े देशों का एक ही लक्ष्य होता है कि छोटे देशों की आजादी, संसाधन और उनकी पहचान को मिटाकर अपना सांस्कृतिक और आॢथक प्रभुत्व स्थापित करना।
भारत की पहचान : देश में आंतरिक तनाव, गृह युद्ध जैसे हालात और अव्यवस्था होते हुए भी भारत सरकार इन पर काबू करने और इनके बेलगाम होने पर रोक लगाने में सफल रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत इन सभी बड़े और आॢथक तथा सैन्य दृष्टि से संपन्न देशों के प्रति अनोखी उदारता दिखाता रहा है। अपनी जीती हुई जमीन लौटाने के लिए प्रसिद्ध है, बंजर कह कर हजारों किलोमीटर भूमि चीन को दे देता है, अपने सैनिकों का बलिदान देकर स्वतंत्र बंगलादेश बनवा देता है। इसी तरह बहुत से ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें भारत ने खोया तो बहुत लेकिन पाया कुछ नहीं। यह एक तरह से इतिहास में कुछ लोगों का विश्व में महान कहलाने का प्रयास है, इसके अलावा कुछ नहीं।
जरा सोचिए, अपने देश के टुकड़े करने की सहमति और कश्मीर में उपद्रवियों के आगे समर्पण और देश की बर्बादी का ऐलान करने वालों को बचाने की मुहिम क्या दर्शाती है? देश में लाखों हैक्टेयर भूमि का अतिक्रमण होते देखना तो एक मामूली बात है। रेलवे और सार्वजनिक भूमि पर बड़ी संख्या में स्लम बस्तियों और झुग्गी-झोंपडिय़ों का होना तथा उन्हें बनाए रखने में अपनी विजय समझना भारत में ही संभव है। सड़क और फुटपाथ पर कब्जा कोई अनहोनी नहीं, वहां परिवार सहित बसना वोटर की पहचान बन जाए, यह हमारे यहां तारीफ की बात है। इसके बाद रिहैब्लिटेशन और रिसैटलमैंट के नाम पर हजारों की संख्या में कालोनियां बन जाती हैं। ‘बुलडोजर जस्टिस’ शब्द पर विवाद हो सकता है लेकिन इसके बिना कोई अन्य विकल्प नहीं है जो इस समस्या का समाधान कर सके।
विश्व में भारत की भूमिका : अनेक विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, बहुत वर्षों बाद राजनीतिक स्थिरता के बल पर भारत जिस प्रकार आॢथक संपन्नता, औद्योगिक विकास और टैक्नोलॉजी के इस्तेमाल के साथ सतत विकास की नीति पर पिछले एक दशक से चल रहा है, संभावना है कि जो देश हमारी सीमाओं से जुड़े हैं, उनमें चीन के अतिरिक्त, सभी देश आने वाले दशक में भारत के साथ आते जाएंगे। राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर कठिनाई हो सकती है लेकिन व्यावहारिक रूप से नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बंगलादेश, म्यांमार तथा आसपास के छोटे देश और यहां तक कि पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान और ईरान तक भारत को केंद्रीय शक्ति के रूप में स्वीकार कर एक वैश्विक महासंघ बनने की भविष्यवाणी सत्य कर सकते हैं। इसका मतलब यह है कि क्योंकि सार्क की भूमिका लगभग समाप्त हो चुकी है, पाकिस्तान अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, बंगलादेश आंतरिक संघर्ष से जूझ रहा है तो ये देश भारत के साथ शत्रुता का भाव रखते हुए भी हमसे सहयोग करने के लिए विवश होंगे।
इसका प्रबल कारण है। अमरीका का भारत और उसके जैसे देशों के प्रति विरोधी रुख अपनाना, उसकी बात न मानने पर सैंक्शन और ऊंचा टैरिफ लगाना ताकि उनकी अर्थव्यवस्था चौपट हो जाए। रूस के साथ डिप्लोमैटिक संबंधों और व्यापारिक हितों में टकराव पैदा हो, जिसका लाभ अमरीका को मिल सके। इस स्थिति में एकमात्र विकल्प है कि भारत का नेतृत्व दक्षिण, पूर्वी और पश्चिमी एशिया के देश स्वीकार करें, ताकि एक सामूहिक ताकत के रूप में सामने आकर, सभी सनकी देशों की चुनौतियों का सामना किया जा सके। यह संभव है क्योंकि मोदी है तो मुमकिन है।-पूरन चंद सरीन
