फुटपाथ पर किसका अधिकार...?
punjabkesari.in Monday, Jul 27, 2026 - 06:01 AM (IST)
मैंने आखिरकार पता लगा लिया है कि अमरीकी क्यों नहीं चलते।
उनके फुटपाथों पर कोई वैंडर
(विक्रेता) नहीं होते।
मैं एक छोटे से अमरीकी शहर में सुबह की सैर पर गया और काफी निराश हुआ। वहां भुनी हुई मूंगफली बेचने वाला एक भी आदमी नहीं था। किसी ने मुझे धूप के चश्मे, मोजे, मोबाइल कवर, गुब्बारे, चाय, वड़ा पाव या बुढ़ापे को छोड़कर बाकी सब ठीक करने की गारंटी देने वाली चमत्कारी दवाएं नहीं दीं।
फुटपाथ...! बस एक फुटपाथ था।
कितनी बर्बादी है।
भारत में हम हर एक वर्ग फुट को उत्पादक बनाने में विश्वास करते हैं।
एक फुटपाथ पर केवल लोगों को चलने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। इसे अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाला बनना चाहिए।
घर से निकलने तक, आपको केले खरीदने, अपना फोन रिचार्ज करने, अपनी चप्पलें ठीक करने, नाश्ता करने, दो टी-शर्ट्स खरीदने, अपना कोरियर लेने और ट्रैफिक पुलिस वाले के साथ बहस करने में सक्षम होना चाहिए, और यह सब फुटपाथ छोड़े बिना।
बशर्ते, आप फुटपाथ ढूंढ सकें।
यही असली चुनौती है।
भारत में, पैदल चलने वाला एक अनचाहे मेहमान की तरह हो गया है। फुटपाथ उन सभी का है, सिवाय उस व्यक्ति के, जो उस पर चलना चाहता है। दुकानदार ने प्यार से अपना शोरूम उस पर फैला दिया है। वैंडर ने स्थायी निवास बना लिया है। मोटरसाइकिल वाले ने तय कर लिया है कि ट्रैफिक जाम के दौरान यह एक बेहतरीन शॉर्टकट है। कारें उस पर पार्क हो जाती हैं क्योंकि सड़क भरी हुई है। निर्माण सामग्री आती है और कभी जाने का नाम नहीं लेती। कहीं बीच में एक अकेला पैदल चलने वाला खड़ा होकर सोचता है कि क्या जीवन बीमा में पैदल चलना शामिल है। बेशक, कोई नहीं पूछता कि यह सब कैसे होता है। वहां हमेशा वह रहस्यमयी अदृश्य व्यवस्था होती है, जिसके बारे में हर कोई जानता है लेकिन कोई बात नहीं करता। यहां एक छोटी सी साप्ताहिक उगाही, जिसे ‘हफ्ता’ कहा जाता है, अधिकारियों द्वारा अनौपचारिक रूप से एकत्र की जाती है। वहां थोड़ा नजरअंदाज कर दिया जाता है। अधिकारी ध्यान न देने का नाटक करते हैं। वैंडर सब कुछ कानूनी होने का नाटक करते हैं। पैदल चलने वाला यह नाटक करता है कि उसे बसों को चकमा देने में मजा आता है।
हर कोई खुश है। सिवाय पैदल चलने वाले के।
अजीब बात यह है कि भारत में संभवत: अमरीका की तुलना में कहीं अधिक लोग पैदल चलते हैं। लाखों लोग कार नहीं खरीद सकते। वे काम पर, स्कूल, रेलवे स्टेशन और बाजार पैदल जाते हैं। इस पर हम उनके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे वे दूसरे दर्जे के नागरिक हों।
फिर हम गर्व से एक और चमकती गगनचुंबी इमारत या एक शानदार पुल का उद्घाटन करते हैं। शानदार। लेकिन क्या अस्सी साल की दादी दवा की दुकान तक जा सकती है, बिना कल की हैडलाइन बनने के जोखिम के?
विकास गगन को छूने वाली इमारतों से शुरू नहीं होता। यह एक ऐसे फुटपाथ से शुरू होता है, जहां एक बच्चा उछल-कूद सके, एक बुजुर्ग आदमी टहल सके, एक मां प्रैम (बच्चों की गाड़ी) को धकेल सके और एक विकलांग व्यक्ति सम्मान के साथ चल सके। किसी देश की महानता उसके टावरों की ऊंचाई से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसके सामान्य नागरिक उनके नीचे कितने सुरक्षित रूप से चल सकते हैं। तब तक, यदि कोई मुझसे पूछता है कि भारत में फुटपाथ पर किसका अधिकार है, तो मेरे पास केवल एक उत्तर है। निश्चित रूप से वह व्यक्ति तो नहीं, जो पैदल चल रहा है...!-दूर की कौड़ी राबर्ट क्लीमैंट्स
